विभाजन के बाद भारत आने वाले लोग शरणार्थी नहीं, बल्कि ‘संघर्ष के योद्धा’ थे : मोहन भागवत

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विभाजन के बाद भारत आने वाले लोग शरणार्थी नहीं, बल्कि ‘संघर्ष के योद्धा’ थे : मोहन भागवत

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  • Publish Date - July 2, 2026 / 12:43 AM IST,
    Updated On - July 2, 2026 / 12:43 AM IST

नागपुर, एक जुलाई (भाषा) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने बुधवार को कहा कि 1947 के विभाजन के बाद भारत आने वाले लोग शरणार्थी नहीं, बल्कि ‘‘संघर्ष के योद्धा’’ थे, जिन्होंने मातृभूमि और धर्म के प्रति प्रेम के कारण भारी कष्ट और पीड़ा सही।

भागवत ने कहा कि इन लोगों ने नये बने पाकिस्तान में अपनी कई पीढ़ियों की मेहनत से अर्जित संपत्ति, जमीन और कारोबार छोड़कर भारत आने का निर्णय लिया।

भागवत यहां सिंधी समुदाय द्वारा संचालित सिंधु एजुकेशन सोसाइटी के 75वें स्थापना दिवस समारोह को संबोधित कर रहे थे।

आरएसएस प्रमुख ने कहा कि विभाजन के बाद लोगों ने सोच-समझकर सीमा पार से भारत आने का फैसला किया, क्योंकि वे भारत भूमि में रहना चाहते थे, जहां वे बिना भय के अपने धर्म का पालन कर सकें।

उन्होंने कहा, ‘‘यद्यपि वे विस्थापित हुए थे, लेकिन वे शरणार्थी नहीं थे, उस समय उनके लिए ‘शरणार्थी’ शब्द का इस्तेमाल करना गलत था। वे मातृभूमि और अपने धर्म के प्रति प्रेम के कारण संघर्ष करने वाले योद्धा थे। वे उस लड़ाई में केवल अपनी गलतियों के कारण नहीं हारे थे।’’

उन्होंने कहा, ‘‘हम सभी भारत को एकजुट बनाए रखने की वह लड़ाई हार गए थे, लेकिन उन्होंने क्या चुना? उन्होंने न तो करियर चुना और न ही संपत्ति। उन्होंने देश और अपने धर्म को चुना।’’

आरएसएस प्रमुख ने सिंधु एजुकेशन सोसाइटी की 75 वर्ष की यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे पड़ाव किसी भी संस्था को अपने कार्यों की समीक्षा करने और अपने उद्देश्यों को याद करने का अवसर प्रदान करते हैं।

जीवन की कठिनाइयों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि प्रतिकूल परिस्थितियों के सामने हार नहीं माननी चाहिए, बल्कि दोबारा उठ खड़े होने का प्रयास करना चाहिए।

भागवत ने कहा, ‘‘परिस्थितियों या भाग्य के सामने स्वयं को असहाय नहीं समझना चाहिए। कठिन समय से निकलने का प्रयास करने वाला व्यक्ति ही अंततः सफल होता है, जबकि कठिनाइयों से भागने वाला पहले ही अपनी हार स्वीकार कर चुका होता है।’’

उन्होंने कहा कि रोजगार के लिए शिक्षा प्राप्त करना महत्वपूर्ण है, लेकिन यही शिक्षा का अंतिम उद्देश्य नहीं होना चाहिए।

भागवत ने कहा कि सही और गलत में अंतर करने की क्षमता विकसित करने के लिए मूल्य आधारित शिक्षा आवश्यक है। उन्होंने कहा कि ऐसी शिक्षा केवल पुस्तकों से नहीं, बल्कि शिक्षकों के आचरण और विद्यार्थियों में उनके द्वारा विकसित किए जाने वाले मूल्यों से भी मिलती है।

उन्होंने कहा कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य अच्छे इंसानों का निर्माण करना और ऐसी पीढ़ी तैयार करना है, जो समाज के कल्याण के प्रति सजग हो।

भाषा अमित सुरेश

सुरेश