आपराधिक शिकायत अगर न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग हो तो पूरी कार्रवाई रद्द की जा सकती: उच्च न्यायालय

आपराधिक शिकायत अगर न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग हो तो पूरी कार्रवाई रद्द की जा सकती: उच्च न्यायालय

आपराधिक शिकायत अगर न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग हो तो पूरी कार्रवाई रद्द की जा सकती: उच्च न्यायालय
Modified Date: July 23, 2026 / 10:56 pm IST
Published Date: July 23, 2026 10:56 pm IST

लखनऊ, 23 जुलाई (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने बृहस्पतिवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान व्यवस्था दी कि जब कोई आपराधिक शिकायत न्यायिक प्रक्रिया का साफ तौर पर दुरुपयोग प्रतीत हो तो उच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 215 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल करके स्वयं पूरी कार्यवाही को रद्द कर सकता है।

अदालत ने कहा कि उसका काम केवल विवादों का निपटारा करना ही नहीं बल्कि आपराधिक न्याय प्रणाली के दुरुपयोग को रोकना भी है।

पीठ ने माना कि उसके समक्ष सुनवाई के लिए आया मामला केवल आरोपी पर कथित रूप से बकाया रकम चुकाने का दबाव बनाने के लिए दर्ज कराई गई थी।

अदालत ने कहा कि ऐसी कार्यवाही को जारी रखने की अनुमति देना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग और न्यायिक समय की अनावश्यक बर्बादी होगी।

न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने लखीमपुर खीरी की एक महिला द्वारा दायर आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया।

इस महिला ने अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम के तहत विशेष न्यायाधीश के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें मुकदमा दर्ज करने के लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 173(4) के तहत दी गई उसकी अर्जी को शिकायत मान लिया गया था।

अदालत ने सुनवाई के दौरान अपने अंतर्निहित अधिकार क्षेत्र का स्वतः संज्ञान लेते हुए न केवल निचली अदालत के आदेश को रद्द किया बल्कि पूरी शिकायत कार्यवाही को भी खत्म कर दिया।

महिला ने आरोप लगाया था कि एक भूखंड की बिक्री को लेकर हुए विवाद के दौरान एक आरोपी ने उसके पति का कथित बकाया धन वापस दिलाने में मदद करने के बहाने उसका यौन शोषण किया। महिला ने यह आशंका भी जताई थी कि आरोपी उसके पति और बच्चे को नुकसान पहुंचा सकता है।

हालांकि, निचली अदालत के सामने पेश की गई पुलिस रिपोर्ट में कहा गया था कि जमीन का विवाद पहले ही सुलझा लिया गया था और उसका भुगतान भी वापस कर दिया गया था, जिसके बाद अंतिम रिपोर्ट दाखिल की गई थी।

उच्च न्यायालय ने आरोपों को स्वाभाविक रूप से असंभव और सामान्य मानवीय व्यवहार के विपरीत पाया।

अदालत ने गौर किया कि शिकायत में जबरदस्ती, दबाव या धोखे का कोई ऐसा आरोप नहीं था जो प्रथम दृष्टया आपराधिक अपराध की श्रेणी में आता हो।

अदालत ने आरोपी के घर पर गलती से हस्ताक्षरित चेक बुक छूट जाने के दावे को भी यकीन के काबिल नहीं पाया।

भाषा सं. सलीम धीरज

धीरज


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