बिहार की बावन बूटी साड़ी, पत्थरकट्टी पत्थर शिल्प, पीढ़िया चित्रकला को जीआई टैग मिला

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बिहार की बावन बूटी साड़ी, पत्थरकट्टी पत्थर शिल्प, पीढ़िया चित्रकला को जीआई टैग मिला

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  • Publish Date - June 13, 2026 / 09:30 PM IST,
    Updated On - June 13, 2026 / 09:30 PM IST

पटना, 13 जून (भाषा) बिहार के तीन खास पारंपरिक उत्पादों – नालंदा की बावन बूटी साड़ियों और कपड़ों, गयाजी की पत्थरकट्टी पत्थर की कलाकारी और भोजपुर की पीढ़िया चित्रकाल को ज्योग्राफिकल इंडिकेशन (जीआई) टैग दिया गया है। एक आधिकारिक बयान में शनिवार को यह जानकारी दी गई।

बिहार में राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि इन तीन उत्पादों को जीआई टैग मिलने से बिहार के हस्तशिल्प और हथकरघा क्षेत्रों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान मिलेगी।

इसमें कहा गया है कि इससे स्थानीय कारीगरों, बुनकरों और महिलाओं के स्वयं-सहायता समूहों के लिए रोजगार और आय के नए अवसर पैदा होंगे।

बयान में कहा गया, “नाबार्ड और बिहार सरकार की संयुक्त कोशिशों से यह बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है।”

जीआई टैग यह सुनिश्चित करता है कि पंजीकृत अधिकृत उपयोगकर्ताओं के अलावा कोई और उस लोकप्रिय उत्पाद के नाम का इस्तेमाल न कर सके। जीआई एक ऐसा लेबल है जो उन सामानों पर लगाया जाता है जिनकी एक खास भौगोलिक जगह से उत्पत्ति होती है और जिनकी खासियतें या पहचान उसी जगह से जुड़ी होती है।

नालंदा की ‘बावन बूटी’ बुनाई परंपरा बिहार की प्राचीन वस्त्र-कला विरासत का एक बेहतरीन उदाहरण है। इस खास कला में कपड़े पर 52 तरह के पारंपरिक डिज़ाइन और सांस्कृतिक प्रतीकों (बूटियों) की हाथ से बुनाई की जाती है। बयान में कहा गया है कि यह कला मुख्य रूप से बसवान बीघा और उसके आस-पास के इलाकों में विकसित हुई, जहां बुनकर परिवारों ने पीढ़ियों से इस परंपरा को संजोकर रखा है।

इसमें कहा गया, “इसी तरह, गयाजी की पारंपरिक पत्थर की कारीगरी अपनी बेहतरीन गुणवत्ता के लिए मशहूर है और इसका इतिहास लगभग 300 साल पुराना है। कारीगर स्थानीय स्तर पर मिलने वाले काले ग्रेनाइट पत्थरों से भगवान बुद्ध, देवी महागौरी, कई देवी-देवताओं और लोक-संस्कृति से जुड़ी अन्य आकृतियों की मूर्तियां बनाते हैं। माना जाता है कि विष्णुपद मंदिर के निर्माण में भी इसी इलाके के ग्रेनाइट पत्थरों का इस्तेमाल किया गया था।”

इसी तरह, भोजपुर की ‘पीढ़िया’ चित्रकला लोक कला का एक अनोखा रूप है, जिसे पारंपरिक रूप से महिलाएं त्योहारों और सामाजिक मौकों पर बनाती हैं।

इसमें कहा गया है कि प्राकृतिक रंगों और पारंपरिक प्रतीकों के जरिए यह कला लोक-जीवन, पारिवारिक रिश्तों, धार्मिक मान्यताओं और ग्रामीण संस्कृति को दर्शाती है।

भाषा प्रशांत रंजन

रंजन