CG High Court News: क्या सरकारी नौकरी वाली बीवी को भी मिलेगा भरण-पोषण? हाईकोर्ट ने सुना दिया बड़ा फैसला
CG High Court News: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों में अंतरिम भरण-पोषण और मुकदमे के खर्च को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
CG High Court News/Photo Credit: IBC24
- हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी की आय पति से अधिक होने पर भी उसे मुकदमे के खर्च और यात्रा भत्ता मिल सकता है
- कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह राशि भरण-पोषण नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए दी जाती है
- हाईकोर्ट ने पति की अपील खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा
बिलासपुर। CG High Court News: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों में अंतरिम भरण-पोषण और मुकदमे के खर्च को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि पत्नी सरकारी नौकरी में हो और उसकी आय पति से अधिक हो, तब भी उसे अदालती कार्यवाही में शामिल होने के लिए यात्रा, भोजन और मुकदमे का खर्च पाने का अधिकार है।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा, जस्टिस बिभू दत्त गुरु की बेंच ने सूरजपुर कुटुंब न्यायालय के आदेश को सही ठहराते हुए पति आशीष राय की अपील खारिज कर दी। मामले के अनुसार अंबिकापुर निवासी आशीष राय और विश्रामपुर निवासी अंजलि राय के बीच वैवाहिक विवाद चल रहा है। पति ने सूरजपुर कुटुंब न्यायालय में तलाक की याचिका दायर की थी। सुनवाई के दौरान पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत अंतरिम भरण-पोषण और मुकदमे के खर्च की मांग की।
कुटुंब न्यायालय दिया था ये आदेश
पति ने आरटीआई से प्राप्त वेतन पर्ची पेश कर बताया कि पत्नी सरकारी शिक्षिका है और उसे 71,482 रुपये मासिक वेतन मिलता है, जबकि वह स्वयं संविदा आयुष चिकित्सा अधिकारी के रूप में लगभग 25,700 रुपये प्रतिमाह कमाता है। इसलिए पत्नी किसी वित्तीय सहायता की पात्र नहीं है। कुटुंब न्यायालय ने माना था कि पत्नी स्वयं का भरण-पोषण करने में सक्षम है, इसलिए मासिक गुजारा भत्ता नहीं दिया जा सकता। लेकिन अदालत ने मुकदमे की पैरवी के लिए 3,000 रुपये एकमुश्त अदालती खर्च तथा प्रत्येक तारीख के लिए यात्रा और भोजन व्यय के मद में 1,000 रुपये प्रतिमाह देने का आदेश दिया था। पति ने फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की।
3,000 रुपये एकमुश्त खर्च कोई बड़ी राशि नहीं
आपत्तियों को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक मुकदमों में पक्षकारों को बार-बार अदालत आना-जाना पड़ता है, जिससे यात्रा और अन्य व्यय होना स्वाभाविक है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह राशि जीवन-यापन के लिए नहीं, बल्कि मुकदमे में प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए दी जाती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि 1,000 रुपये प्रतिमाह और 3,000 रुपये एकमुश्त खर्च कोई अत्यधिक राशि नहीं है तथा इससे पति पर कोई गंभीर आर्थिक बोझ पड़ने की संभावना नहीं है। अपील को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया गया।
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