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नयी दिल्ली, 16 मई (भाषा) भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर मामले में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के फैसले में अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा 2019 में सुनाए गए ऐतिहासिक फैसले में निर्धारित 10 सिद्धांतों का उल्लेख किया गया है।
धार जिले में विवादित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर को देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर घोषित करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि विवादित क्षेत्र के स्वरूप का निर्धारण करते समय उसे उन 10 सिद्धांतों को ध्यान में रखना पड़ा।
न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की पीठ ने कहा, ‘‘हमने पुरातात्विक, ऐतिहासिक तथ्यों, एएसआई की अधिसूचनाओं और सर्वेक्षण रिपोर्ट पर एएसआई अधिनियम के वैधानिक प्रावधानों की कसौटी के साथ-साथ अयोध्या मामले में निर्धारित सिद्धांतों के आधार पर विचार किया है; कि पुरातत्व एक ऐसा विज्ञान है जो बहु-विषयक या अंतर-विषयक दृष्टिकोणों का सहारा लेता है और पुरातात्विक साक्ष्यों की प्रकृति पर विचार करता है।’’
शुक्रवार को अपने फैसले में उच्च न्यायालय ने कहा कि वह विवादित क्षेत्र की संपत्ति के मालिकाना हक का निर्धारण नहीं कर रहा है।
उसने कहा कि अयोध्या मामले में दिया गया फैसला एक दीवानी मुकदमे से संबंधित है, जिसमें विवादित क्षेत्र पर मालिकाना हक के दावे पर गौर किया गया था।
उच्च न्यायालय ने कहा, ‘‘इस मामले में, जैसा कि हम मानते हैं कि हमें ऐतिहासिक साहित्य, पुरातात्विक विशेषताओं, एएसआई सर्वेक्षण रिपोर्ट आदि के आधार पर विवादित क्षेत्र के स्वरूप का निर्धारण करना है। विवादित क्षेत्र के स्वरूप का निर्धारण करने के लिए हमें अयोध्या मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित 10 सिद्धांतों को ध्यान में रखना पड़ा।’’
पीठ ने स्पष्ट किया कि पहला सिद्धांत यह है कि इस तरह के मामलों की जांच के लिए ‘साक्ष्य के भार’ की कसौटी ‘गणितीय निश्चितता’ या ‘संदेह से परे प्रमाण’ की नहीं होनी चाहिए, बल्कि अदालतों को ‘संभाव्यता की प्रबलता’ के मानक को स्वीकार करना चाहिए।
उच्च न्यायालय ने कहा है कि एक अन्य सिद्धांत यह भी कहता है कि आधुनिक न्यायालयों की जांच का उद्देश्य संरचना की धार्मिक पूर्णता का पता लगाना नहीं हो सकता है, बल्कि आस्था और विश्वास, पूजा, बंदोबस्ती की निरंतरता, बंदोबस्ती की प्रकृति और क्या यह शाश्वत रूप से मौजूद है या नहीं, धार्मिक उपयोग, उपासक का आचरण, ऐतिहासिक दावा और धार्मिक विश्वास की निरंतरता के साक्ष्य का पता लगाना है।
उच्च न्यायालय ने कहा कि अयोध्या फैसले से निकला एक और सिद्धांत यह है कि देवता, समर्पित संपत्ति और उसके पीछे निहित पुण्य उद्देश्य की रक्षा करना आधुनिक अदालतों का सर्वोपरि उद्देश्य है; और इस प्रकार, देवता के हितों या उस उद्देश्य की रक्षा स्वयं उसके लाभार्थियों, यानी उपासकों द्वारा की जा सकती है।
उच्च न्यायालय ने कहा, ‘‘चौथा सिद्धांत नष्ट हुई मूर्ति के अस्तित्व या उपस्थिति से संबंधित है। मूर्ति का नष्ट होना या अनुपस्थित होना धार्मिक उद्देश्य की समाप्ति का कारण नहीं बनता और परिणामस्वरूप पुण्य उद्देश्य या बंदोबस्ती की समाप्ति नहीं होती।’’
उच्च न्यायालय ने कहा कि एक अन्य सिद्धांत उस महत्वपूर्ण सिद्धांत को मान्यता देता है, जब आधुनिक न्यायालयों को आस्था और विश्वास के मामलों का मूल्यांकन करना होता है।
पीठ ने कहा, ‘‘विश्वास और आस्था को सर्वोपरि महत्व का माना जाता है। हालांकि, अदालतों को यह भी समझना चाहिए कि इन्हें हमेशा प्रत्यक्ष दस्तावेजी साक्ष्यों से सिद्ध नहीं किया जा सकता और न ही उन्हें हमेशा धर्मनिरपेक्ष तर्क का पालन करना चाहिए।’’
उच्च न्यायालय ने कहा कि सिद्धांत संख्या छह आधिकारिक राजपत्रों या अदालतों द्वारा राजपत्रिकाओं के साक्ष्य मूल्य की स्थिति को स्पष्ट करता है।
पीठ ने एक अन्य सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि आधिकारिक विवरण, प्रशासनिक नामकरण, सरकारी पत्राचार और समकालीन आधिकारिक अभिलेखों का भौतिक साक्ष्य मूल्य हो सकता है, जहां वे किसी विवादित स्थल की पहचान उसके धार्मिक या ऐतिहासिक जुड़ाव के संदर्भ में लगातार करते हैं।
उसने कहा कि कि आठवां सिद्धांत ‘इस्तेमाल के आधार पर वक्फ’ के सिद्धांत से संबंधित था।
उच्च न्यायालय ने कहा, ‘‘अयोध्या का मामला यह दर्शाता है कि आंतरिक धार्मिक सिद्धांत, चाहे हिंदू पक्ष द्वारा भूमि के स्वयं कानूनी व्यक्तित्व के रूप में दिये गए हों या मुस्लिम पक्ष द्वारा संपूर्ण विवादित संपत्ति पर उपयोग द्वारा वक्फ के रूप में लागू किए गए हों, उन्हें इस तरह से स्वीकार नहीं किया जा सकता, जिससे दूसरे समुदाय के स्थापित धार्मिक अधिकार स्वतः ही नष्ट हो जाएं।’’
पीठ ने कहा कि एक अन्य सिद्धांत भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्ट से संबंधित था।
उच्च न्यायालय ने कहा कि आधुनिक न्यायालयों को किसी विवाद का मूल्यांकन करने के लिए जिस सिद्धांत का पालन करना होता है, वह यह है कि पुरातत्व विज्ञान, जिसमें बहुविषयक और अंतर्विषयक दृष्टिकोण शामिल हैं, विशेषज्ञों द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट की ताकत है और इसे साक्ष्य का कमजोर रूप नहीं माना जा सकता।
अदालत ने कहा, ‘‘निष्कर्षों का आकलन पूर्ण सत्य के बजाय संभाव्यता की प्रबलता के सिद्धांत को लागू करके किया जाना चाहिए।’’
उच्च न्यायालय ने कहा कि एक अन्य सिद्धांत यह है कि विवाद धार्मिक चरित्र, ऐतिहासिक उपयोग, पूजा की निरंतरता, या किसी संरक्षित या विवादित धार्मिक स्थल पर प्रतिस्पर्धी दावों से संबंधित हो, तो धार्मिक रूपांकनों, कला, उपकरणों, मूर्तियों, शिलालेखों और स्थापत्य तत्वों की पुरातात्विक खोजें, जो किसी विशेष धर्म की पूर्व-मौजूद संरचना को प्रदर्शित करती हैं, उच्च प्रामाणिक मूल्य की हो सकती हैं।
भाषा राजकुमार दिलीप
दिलीप