नयी दिल्ली, 16 मई (भाषा) केंद्र ने उच्चतम न्यायालय में दलील दी है कि संविधान में निर्वाचन आयोग (ईसी) में नियुक्ति के लिए गठित समिति में न्यायिक प्रतिनिधित्व की अनिवार्यता नहीं है और न्यायपालिका का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्य को शामिल करना ‘‘विधायी विकल्प है, संवैधानिक अनिवार्यता नहीं’’।
सरकार ने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023, निर्वाचन आयोग के किसी भी कार्य में हस्तक्षेप नहीं करता है।
केंद्र ने ये दलीलें उच्चतम न्यायालय में दाखिल जवाबी हलफनामे में दी हैं, जो मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को विनियमित करने वाले 2023 के कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं के एक समूह पर सुनवाई कर रहा है।
अधिनियम दो जनवरी, 2024 को लागू हुआ। इसमें प्रावधान है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष की सदस्यता वाली एक चयन समिति की सिफारिश पर की जाएगी।
इस कानून के तहत तीन सदस्यीय चयन समिति में प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) के स्थान पर एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को नियुक्त किया गया है।
केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में कहा, ‘‘यह रेखांकित करना अहम है कि संविधान में निर्वाचन आयोग से संबंधित नियुक्ति समितियों में न्यायिक प्रतिनिधित्व अनिवार्य नहीं है। न्यायपालिका का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्य को शामिल करना विधायी निर्णय है, संवैधानिक अनिवार्यता नहीं।’’
केंद्र ने कहा कि नियुक्तियों को वैध बनाने के लिए न्यायिक भागीदारी आवश्यक है, ऐसा सुझाव देना ‘‘शक्तियों के पृथक्करण और अनुच्छेद 324 के तहत संसद की भूमिका को गलत तरीके से प्रस्तुत करता है’’।
हलफनामा के मुताबिक संविधान के अनुच्छेद 324 में कहा गया है कि चुनावों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण का अधिकार निर्वाचन आयोग के पास होगा।
केंद्र द्वारा 13 मई को दाखिल हलफनामे में कहा गया है, ‘‘ निर्वाचन आयोग की वास्तविक स्वतंत्रता उसके संवैधानिक दर्जे, कार्यकाल की सुरक्षा, पद से हटाने संबंधी सुरक्षा उपायों और उसके कार्यों और वेतन-भत्तों के वैधानिक संरक्षण से उत्पन्न होती है। 2023 का अधिनियम इन विशेषताओं को बरकरार रखते हुए, उनकी नियुक्ति में प्रक्रियात्मक पारदर्शिता जोड़ता है।’’
इसमें कहा गया है कि न तो कोई दलील दी गई है और न ही यह साबित किया गया है कि चुनौती दिये गए अधिनियम के लागू होने से पहले चुनाव आयुक्तों के रूप में की गई नियुक्तियां गंभीर प्रश्नचिह्न के दायरे में हैं क्योंकि कार्यपालिका के पास नियुक्तियां करने की अनन्य शक्ति थी।
हलफनामा में कहा गया, ‘‘ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया है कि राष्ट्रपति के अधिकार के तहत की गई नियुक्तियों के कारण ही स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव प्रभावित हुए हों।’’
केंद्र ने दलील दी कि उच्चतम न्यायालय ने दो मार्च, 2023 के अनूप बरनवाल फैसले में यह राय व्यक्त की थी कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और यदि ऐसा कोई नेता न हो तो लोकसभा में संख्यात्मक शक्ति के आधार पर विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी के नेता और प्रधान न्यायाधीश की समिति द्वारा दी गई सलाह के आधार पर की जानी चाहिए।
इसमें कहा गया, ‘‘हालांकि, इस न्यायालय ने माना कि उक्त निर्णय के माध्यम से इसके द्वारा निर्धारित उक्त मानदंड तभी तक मान्य रहेगा जब तक संसद इस संबंध में कोई कानून नहीं बनाती।’’
केंद्र ने कहा कि अदालत की राय का यह अभिप्राय नहीं है कि यह ‘‘संसद के हाथ बांध देती है’’।
इसमें कहा गया है कि शीर्ष अदालत का निर्देश स्वीकार्य रूप से केवल फैसले की तारीख से लेकर उस तारीख तक की अंतरिम अवधि के लिए लागू होता है जिस पर संसद अनुच्छेद 324(2) के अनुरूप कानून अधिनियमित करती है।
हलफनामे में कहा गया, ‘‘अंतरिम अवधि की व्यवस्था को कानून का दर्जा प्राप्त नहीं था। इस प्रकार के सुझावों को न्यायालयों द्वारा सकारात्मक कानून का दर्जा नहीं दिया जा सकता।’’
इसमें कहा गया कि एक जीवंत लोकतांत्रिक देश के रूप में, भारत ने नागरिकों की शांति, समृद्धि, विकास और कल्याण के लिए निर्वाचन आयोग जैसे लोकतांत्रिक संस्थानों के निरंतर अस्तित्व को हमेशा पोषित और संरक्षित किया है।
हलफनामा में कहा गया, ‘‘इस प्रकार, याचिकाकर्ताओं द्वारा सरकार पर कपटपूर्ण इरादे और पूर्वाग्रह के आरोप पूरी तरह निराधार हैं। यह सर्वविदित है कि सक्षम विधायिका द्वारा विधिवत निर्मित किसी भी कानून को इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती कि इसे किसी गुप्त उद्देश्य से बनाया गया है।’’
केंद्र ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के आरोप के विपरीत, यह संकेत देना कि न्यायपालिका के सदस्यों के बिना चयन समितियां हमेशा पक्षपाती होंगी, पूरी तरह से गलत है।
इसमें कहा गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त की स्वतंत्रता, चयन के तरीके से कहीं अधिक, व्यक्ति के कामकाज और उसकी पेशेवर उत्कृष्टता के गुणों पर निर्भर करती है।
हलफनामे में कहा गया कि न्यायपालिका के सदस्यों को चयन समिति का हिस्सा बनाने के लिए किसी संवैधानिक प्रावधान के अभाव में, यह कहना निराधार है कि संसद द्वारा कानून के तहत, अपने सामूहिक विवेक से, गठित चयन समिति पक्षपाती होगी।
इसमें कहा गया कि यह आरोप कि संसद ने 2023 अधिनियम से संबंधित विधेयक पर विचार करते समय जानबूझकर कई सांसदों को निलंबित कर दिया, निराधार है और संवैधानिक और कानूनी दोनों ही कसौटी पर टिकने वाला नहीं है।
केंद्र सरकार ने कहा, ‘‘यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि संसद के सदनों की कार्यवाही का संचालन अध्यक्ष के पास होता है, चाहे वह लोकसभा अध्यक्ष हो या राज्यसभा के सभापति, और यह किसी भी मंच के समक्ष प्रश्न का विषय नहीं हो सकता।’’
हलफनामे में कहा गया है कि अब तक नियुक्त किसी भी चुनाव आयुक्त की योग्यता या उपयुक्तता के संबंध में कोई आरोप नहीं लगाया गया है।
भाषा धीरज प्रशांत
प्रशांत