सभी दोषियों को फांसी न मिलने तक न्याय अधूरा : दिल्ली दंगे में मारे गए आईबी अधिकारी के परिजन

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सभी दोषियों को फांसी न मिलने तक न्याय अधूरा : दिल्ली दंगे में मारे गए आईबी अधिकारी के परिजन

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  • Publish Date - July 13, 2026 / 10:46 PM IST,
    Updated On - July 13, 2026 / 10:46 PM IST

(वर्षा सागी)

नयी दिल्ली, 13 जुलाई (भाषा) आसूचना ब्यूरो (आईबी) के अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या के लगभग छह साल बाद पूर्व स्थानीय पार्षद ताहिर हुसैन सहित पांच आरोपियों को दोषी करार दिए जाने से पीड़ित परिजन को कुछ राहत तो मिली है, लेकिन खालीपन का गहरा एहसास अब भी उन्हें परेशान कर रहा है।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रवीण सिंह ने फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में दंगे के दौरान शर्मा की हत्या से जुड़े मामले में आम आदमी पार्टी (आप) के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन, हसीन उर्फ ​​मुल्लाजी उर्फ ​​सलमान, नजीम, कासिम और समीर खान को सोमवार को दोषी करार दिया।

इस फैसले ने शर्मा के परिवार की दर्दनाक यादें ताजा कर दी हैं, जो दिल्ली से दूर अपनी जिंदगी को नये सिरे से बसा रहा है।

शर्मा के परिवार के एक सदस्य ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, “यह बताना बहुत मुश्किल है कि हमारा परिवार अभी किस दौर से गुजर रहा है। एक तरह से राहत भी है, क्योंकि अदालत ने कुछ आरोपियों को दोषी ठहराया है, लेकिन साथ ही वे सभी दर्दनाक यादें भी ताजा हो गई हैं।”

अंकित के भाई ने कहा कि इस फैसले ने परिवार को उस भयानक पल की याद दिला दी है, जब उन्हें पहली बार शर्मा की मौत के बारे में पता चला था।

उन्होंने कहा, “दुख है, गुस्सा है और एक ऐसा खालीपन है, जिसे कभी भरा नहीं जा सकता। हमने अपने परिवार के सबसे मजबूत स्तंभों में से एक को खो दिया है और कोई भी फैसला उन्हें वापस नहीं ला सकता।”

शर्मा के परिजन ने कहा कि हिंसा के बाद उनकी जिंदगी पूरी तरह से बदल गई और उन्होंने घटना के कुछ ही महीनों के अंदर दिल्ली छोड़ने का फैसला कर लिया।

उन्होंने कहा, “घटना के दो-तीन महीने के भीतर ही हमने दिल्ली छोड़ दी। जो हुआ, उसके बाद हमें वहां‍ रहना सुरक्षित महसूस नहीं हुआ। अब हम उत्तर प्रदेश में किराये के एक मकान में रहते हैं। हमारी जिंदगी पूरी तरह से बदल गई है। डर का एहसास हमेशा हमारे साथ रहता है।”

घटना वाले दिन को याद करते हुए पीड़ित के एक परिजन ने कहा कि शर्मा अपनी ड्यूटी के तहत केवल हालात का जायजा लेने के लिए गए थे।

शर्मा के भाई ने कहा, “मेरे भाई (अंकित शर्मा) उस समय ड्यूटी पर थे, जब उनकी बेरहमी से हत्या कर दी गई। वह देश की सेवा कर रहे थे। आईबी के अधिकारी आम तौर पर अपनी पहचान जाहिर नहीं करते, इसलिए उन्होंने खुद को दिल्ली पुलिस का अधिकारी बताया था।”

उन्होंने कहा, “मेरी भाई को उनके वरिष्ठ अधिकारियों ने हालात का जायजा लेने के लिए भेजा था। उनकी क्या गलती थी? वह तो बस अपना फर्ज निभा रहे थे। हमें लगता है कि उन्हें उनके धर्म की वजह से निशाना बनाया गया और यह दर्द हर पल हमारे साथ रहा है।”

शर्मा के भाई ने कहा कि परिवार पांच आरोपियों को दोषी ठहराए जाने को लेकर अदालत का आभारी है, लेकिन असली न्याय तब होगा, जब हत्या में शामिल सभी लोगों को जवाबदेह ठहराया जाएगा।

उन्होंने कहा, “हम चाहते हैं कि दोषियों को सबसे कठोर सजा मिले। आज सिर्फ कुछ लोगों को दोषी ठहराया गया है। हम चाहते हैं कि मेरे भाई की हत्या में शामिल हर एक व्यक्ति को सजा मिले… उन्हें फांसी होनी चाहिए।”

पीड़ित के भाई ने कहा कि इस फैसले ने शर्मा के आखिरी दिनों की यादें ताजा कर दीं।

उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, “मेरे भाई का जन्मदिन दो फरवरी को था और उसके कुछ ही दिन बाद हमने उन्हें खो दिया। वह युवा थे, सपनों से भरे थे और शादी करने के बारे में सोच रहे थे। उस दिन के बाद हमारे पूरे परिवार का भविष्य हमेशा के लिए बदल गया।”

यह मामला दयालपुर पुलिस थाने में शर्मा के पिता रवींद्र कुमार की शिकायत पर दर्ज प्राथमिकी पर आधारित था।

शिकायत के मुताबिक, आईबी में तैनात शर्मा 25 फरवरी 2020 को दफ्तर से घर लौटे थे और उसके बाद फिर बाहर निकले थे।

इसमें कहा गया था कि जब शर्मा वापस नहीं आए, तो परिजन ने उनकी तलाश शुरू की और बाद में पता चला कि उनकी हत्या कर दी गई है।

शर्मा का शव चांद बाग पुलिया इलाके में एक मस्जिद के पास खजूरी खास नाले से बरामद हुआ था।

यह वारदात फरवरी 2020 में नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (सीएए) के विरोध में हुए प्रदर्शनों के दौरान उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भड़की सांप्रदायिक हिंसा के समय हुई थी। इन दंगों में 53 लोगों की जान चली गई थी और कई लोग घायल हो गए थे।

शर्मा के पिता ने आरोप लगाया कि उनके बेटे की हत्या हुसैन और उन लोगों ने की थी, जो पूर्व पार्षद के दफ्तर में जमा हुए थे।

भाषा पारुल वैभव

वैभव