खरगे ने राज्यसभा के सेवानिवृत्त सदस्यों को दी विदाई, सदन के नियमों की समीक्षा की मांग की

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खरगे ने राज्यसभा के सेवानिवृत्त सदस्यों को दी विदाई, सदन के नियमों की समीक्षा की मांग की

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  • Publish Date - March 18, 2026 / 02:46 PM IST,
    Updated On - March 18, 2026 / 02:46 PM IST

नयी दिल्ली, 18 मार्च (भाषा) राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने बुधवार को सेवानिवृत्त हो रहे सदस्यों को विदाई दी और सदन की कार्यवाही के नियमों की समय-समय पर समीक्षा की आवश्यकता जताई।

खरगे ने कहा कि सदन में अधिक बैठकें होनी चाहिए ताकि सार्वजनिक महत्व के मुद्दों पर गंभीरता से विचार-विमर्श किया जा सके। उन्होंने विधेयक तैयार करने में विपक्षी सदस्यों की अधिक भागीदारी की भी वकालत करते हुए कहा कि यदि इसमें बाधा आए, तो संसद की संस्थागत शक्ति कमजोर होगी।

उच्च सदन में नेता प्रतिपक्ष ने कहा ‘‘मेरा दृढ़ विश्वास है कि राज्यसभा के नियमों की समय-समय पर समीक्षा जरूरी है। यह मामला वर्तमान में सामान्य प्रयोजन समिति (जीपीसी) के समक्ष विचाराधीन है और इस पर गंभीर रूप से विचार करने की आवश्यकता है।’’

खरगे स्वयं सेवानिवृत्त हो रहे हैं, लेकिन उन्हें अगला कार्यकाल मिलेगा। उन्होंने कहा, ‘‘राजनीति में लोग कभी सार्वजनिक जीवन से सेवानिवृत्त नहीं होते, और न ही देश सेवा के अपने उत्साह में कभी थकते हैं।’’

उन्होंने कहा कि संस्थाएं स्थायी होती हैं, जबकि उनमें कार्यरत लोगों के चेहरे बदलते रहते हैं। ‘‘जिन सहयोगियों का पुनः निर्वाचन हुआ है, उनका हम स्वागत करते हैं। और जो सदस्य सेवानिवृत्त हो रहे हैं, मुझे विश्वास है कि वे भविष्य में भी सार्वजनिक जीवन में सार्थक योगदान देंगे। यहां प्राप्त अनुभव उन्हें और भी महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाने में सक्षम बनाएगा।’’

सदन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संबोधन के बाद अपनी बात रख रहे खरगे ने कहा कि उन्होंने अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए हमेशा सभी पक्षों के विचार सुनने का प्रयास किया और रचनात्मक सुझावों को लागू करने की कोशिश की।

उन्होंने कहा कि उन्हें इस उच्च सदन में सुखद और चुनौतीपूर्ण अनुभव दोनों मिले। ‘‘मेरा दृढ़ विश्वास है कि इस सदन को और अधिक सार्थक बनाने के लिए नयी पहल की आवश्यकता है, ताकि यह समाज और राष्ट्र के लिए सकारात्मक संदेश दे सके और प्रभावी मार्गदर्शन प्रदान कर सके।’’

खरगे ने कहा कि संविधान हर संसद सदस्य को निडर होकर अपने विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता देता है, और यदि चर्चा एवं विमर्श नहीं होगा तो संसदीय संस्थाओं का कोई वास्तविक महत्व नहीं रह जाएगा।

उन्होंने कहा, ‘‘यदि विचार की स्वतंत्रता सीमित होती है, तो कई मार्ग बंद हो जाते हैं। जब अच्छी विधायिका बनती है, तो केवल सत्ताधारी पार्टी ही नहीं, बल्कि विपक्षी सांसद भी उसकी रूपरेखा में समान भूमिका निभाते हैं। वे संसदीय समितियों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मुझे लगता है कि इन भूमिकाओं में किसी भी प्रकार की बाधा संसदीय संस्थाओं को कमजोर करेगी।’’

सदन की बैठकों की संख्या बढ़ाने और सार्वजनिक हित के मुद्दों पर गंभीर विचार-विमर्श करने की आवश्यकता पर भी खरगे ने जोर दिया।

उन्होंने कहा, ‘‘गरीब, हाशिए पर रहे वर्ग, किसानों और श्रमिकों के हितों से संबंधित मुद्दों पर अधिक चर्चा की जानी चाहिए। अक्सर जब हम ये मुद्दे उठाते हैं, तो सत्ताधारी पार्टी इसे आलोचना समझकर बिना सुने खंडन शुरू कर देती है; जबकि सरकार को जनता की चिंताओं पर गंभीर विचार करना चाहिए।’’

विपक्ष के नेता ने यह भी कहा कि सीमित अवसरों में, जब सांसद महत्वपूर्ण बिंदु उठाते हैं, तो अक्सर उनके विचारों को कार्यवाही से हटा दिया जाता है, भले ही वे असंसदीय न हों। उन्होंने कहा, ‘‘विशेष शब्दों को हटाने से वक्तव्य के अर्थ और आशय ही बदल जाते हैं।’’

भाषा मनीषा अविनाश

अविनाश

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