प्रयागराज, एक अक्टूबर (भाषा) वर्ष 1982 में पत्नी की हत्या के एक मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने घटना के 43 साल बाद आरोपी पति को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। पति को निचली अदालत ने आरोप से बरी कर दिया था।
अदालत ने मुख्य आरोपी अवधेश कुमार के साथ ही सह आरोपी माता प्रसाद को कुसुमा देवी की हत्या करने के लिए आजीवन कारावास की सजा सुनाई और दोषी व्यक्तियों को दो सप्ताह के भीतर अधिकारियों के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।
न्यायमूर्ति राजीव गुप्ता और न्यायमूर्ति हरवीर सिंह की खंडपीठ ने यह आदेश पारित करते हुए इन आरोपियों को बरी करने के निचली अदालत के 1984 के निर्णय को पलट दिया। इस मामले में दो अन्य आरोपियों की मुकदमे के दौरान मृत्यु हो गई।
अभियोजन पक्ष के मुताबिक, अवधेश कुमार का अपने छोटे भाई की पत्नी से अवैध संबंध था जिसका विरोध करने पर अवधेश और तीन अन्य लोगों ने कुसुमा देवी की छह अगस्त, 1982 को गला घोटकर हत्या कर दी थी।
दो गवाहों ने बाद में गवाही दी कि कुसुमा देवी के शरीर से भूत भगाने के बहाने इन आरोपियों ने उसका गला घोट दिया और जल्दबाजी में उसी रात उसका शव जला दिया। अदालत ने 25 सितंबर को पारित आदेश में इसे अंधविश्वास का एक मामला बताया।
अदालत ने कहा, “यह मामला दूर दराज के इलाकों में विभिन्न संस्कृति में मौजूद अंधविश्वास का एक क्लासिक मामला है जो हमारे विचार से सभ्य समाज की अंतरात्मा को झकझोर देता है और ऐसा सामाजिक बुराइयों पर अंकुश लगाने के लिए सभी को इसकी निंदा करनी चाहिए।”
अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष के गवाहों की गवाही इस मामले में लगभग सभी तथ्यों से मेल खाती है।
अदालत ने यह भी पाया कि पीड़िता की मौत के तुरंत बाद आरोपियों ने पुलिस और मृतक के रिश्तेदारों को सूचित किए बगैर शव को ले जाकर जला दिया। इससे कानूनी दंड से खुद को बचाने के उनके इरादे का साफ पता चलता है।
भाषा
सं, राजेंद्र, रवि कांत रवि कांत