दुष्कर्म में भाई की मदद करने के जुर्म में महिला को 10 साल की कैद

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दुष्कर्म में भाई की मदद करने के जुर्म में महिला को 10 साल की कैद

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  • Publish Date - March 31, 2026 / 04:11 PM IST,
    Updated On - March 31, 2026 / 04:11 PM IST

नयी दिल्ली, 31 मार्च (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक महिला को 2013 में दुष्कर्म के अपराध को अंजाम देने में अपने नाबालिग भाई की मदद करने के जुर्म में 10 साल की जेल की सजा सुनाई है।

न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा ने कहा कि दोषी महिला ने पीड़िता का भरोसा तोड़ा और उसे बहला-फुसलाकर अपराध स्थल पर ले जाने में “सक्रिय” भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि दोषी महिला न केवल दुष्कर्म के दौरान मौजूद थी, बल्कि उसने पीड़िता को अपराध का खुलासा न करने की धमकी भी दी थी।

अभियोजन पक्ष के मुताबिक, दोषी महिला ने अपने भाई के साथ मिलकर साजिश रची और पीड़िता को रोजगार का झांसा देकर नजफगढ़ में एक सुनसान जगह पर ले गई, जहां दुष्कर्म की वारदात घटी। इस महिला के खिलाफ हत्या का एक मामला भी दर्ज है।

न्यायमूर्ति सुधा ने दोषी महिला के आपराधिक रिकॉर्ड का संज्ञान लेते हुए कहा कि यह मामला “दिखाता है कि महिला की आपराधिक प्रवृत्ति बरकरार है” और उसमें सुधार का कोई संकेत नहीं मिलता है।

उन्होंने महिला को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 109 (किसी अपराध के लिए उकसाने), जिसे धारा 376 (बलात्कार) के साथ पढ़ा जाए, के तहत दोषी करार देते हुए दस साल के कठोर कारावास और 50,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई।

उच्च न्यायालय ने कहा, “इस मामले में नरम रुख अपनाना, जहां दोषी गंभीर आपराधिक गतिविधियों में शामिल है, पूरी तरह से अनुचित और सजा के स्थापित सिद्धांतों के खिलाफ होगा।”

उसने दोषी महिला को आईपीसी की धारा 366 (किसी महिला का अपहरण करना या उस पर शादी का दबाव बनाना) के तहत पांच साल के कठोर कारावास और 20,000 रुपये के जुर्माने, धारा 506 भाग 2 (आपराधिक धमकी) के तहत एक साल के कारावास तथा धारा 323 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाने के लिए सजा) के तहत तीन महीने के कारावास की सजा भी सुनाई।

उच्च न्यायालय ने 25 मार्च को पारित आदेश में कहा कि महिला की सभी सजा एक साथ चलेंगी।

अदालत ने आदेश दिया कि जुर्माने की राशि में से 50,000 रुपये पीड़िता को मुआवजे के रूप में दिए जाएं। उसने दिल्ली राज्य विधि सेवा प्राधिकरण को भी पीड़िता को उचित मुआवजा देने का निर्देश दिया।

उच्च न्यायालय ने कहा कि पीड़िता को एक दशक से अधिक समय तक न्याय के लिए संघर्ष करते हुए काफी भावनात्मक, मानसिक और शारीरिक पीड़ा झेलनी पड़ी है, जिसके लिए उसे मुआवजा दिया जाना चाहिए।

भाषा पारुल नरेश

नरेश

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