आपातकाल के 51 साल : इंदौर में जुटे देश भर के मीसाबंदी, 100 साल के ‘लोकतंत्र सेनानी’ का सम्मान

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आपातकाल के 51 साल : इंदौर में जुटे देश भर के मीसाबंदी, 100 साल के ‘लोकतंत्र सेनानी’ का सम्मान

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  • Publish Date - July 19, 2026 / 06:59 PM IST,
    Updated On - July 19, 2026 / 06:59 PM IST

इंदौर (मध्यप्रदेश), 19 जुलाई (भाषा) देश में 1975 में लगाए गए आपातकाल के 51 वर्ष पूरे होने पर रविवार को इंदौर में देशभर के मीसाबंदी जुटे। उन्होंने आपातकाल की यादें ताजा करते हुए कहा कि उस दौर में नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए थे और असहमति की आवाजों को दबा दिया गया था।

इंदौर में ‘लोकतंत्र सेनानी संघ’ नामक संगठन की ओर से आयोजित मिलन समारोह में 100 वर्षीय रामकिशन शर्मा और अन्य मीसाबंदियों का सम्मान भी किया गया।

इस अवसर पर कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने कहा कि 25 जून 1975 को लगाया गया आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का ऐसा दौर था, जब मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए, प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया गया और तत्कालीन सरकार से असहमति रखने वाले हजारों लोगों को जेलों में डाल दिया गया।

गहलोत ने कहा कि तत्कालीन सरकार ने आपातकाल के दौरान लोकतंत्र के चारों स्तंभों- न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका और प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाकर इन्हें केंद्र के नियंत्रण में कर दिया।

उन्होंने कहा कि वह स्वयं भी आपातकाल के दौरान उज्जैन की जेल में 54 दिन तक मीसाबंदी के रूप में रहे थे और उस दौर के हालात के गवाह हैं।

गहलोत ने भारतीय लोकतंत्र की मजबूती में मीसाबंदियों के योगदान की सराहना करते हुए कहा,‘‘मैं उन सभी लोकतंत्र सेनानियों (मीसाबंदियों) का हृदय से अभिनंदन करता हूं और उन्हें विनम्र नमन करता हूं जिन्होंने आपातकाल के कठिन दौर में अन्याय और दमन के सामने झुकने के स्थान पर लोकतंत्र की रक्षा का मार्ग चुना।’’

उन्होंने कहा कि इन दिनों भारत जब 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है, तब लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करना, नागरिकों में संवैधानिक मूल्यों के प्रति जागरूकता बढ़ाना और युवाओं को लोकतांत्रिक संस्कृति से जोड़ना अत्यंत आवश्यक है।

राज्यपाल ने कहा, ‘‘हमारी युवा पीढ़ी को जानना चाहिए कि लोकतंत्र हमें सहज रूप से प्राप्त नहीं हुआ, इसके पीछे स्वतंत्रता सेनानियों का बलिदान है, संविधान निर्माताओं की दूरदृष्टि है और लोकतंत्र सेनानियों का संघर्ष है।’’

कार्यक्रम में शामिल 100 वर्षीय मीसाबंदी रामकिशन शर्मा ने आपातकाल के सामाजिक और राजनीतिक हालात का आंखों देखा हाल सुनाते हुए बताया कि वह उस दौरान 19 महीने तक जेल में बंद रहे थे।

शर्मा ने कहा कि 51 साल पहले देश में आपातकाल लगाए जाने के वक्त गरीबी हटाने और सामाजिक समानता लाने जैसे मुद्दों को लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार की ‘वादाखिलाफी’ पर जनता नाराज थी।

उन्होंने कहा कि आपातकाल की जड़ में सत्ता और विपक्ष के बीच संवाद न होना भी था।

शर्मा ने कहा,‘‘आज भी जरूरत है कि सत्ता और विपक्ष के लोग आपस में बात करें। अगर वे आपस में संवाद नहीं करेंगे, तो तब (आपातकाल) जो स्थिति थी, अब भी वैसी ही स्थिति हो जाएगी।’’

उन्होंने कहा कि मौजूदा दौर में देश में आधारभूत ढांचे और उद्योगों के विकास के क्षेत्रों में अच्छा काम हुआ है, लेकिन पढ़े-लिखे युवाओं की बेरोजगारी अब भी प्रमुख चुनौती बनी हुई है।

इस मिलन समारोह में मेजबान मध्यप्रदेश के साथ ही राजस्थान, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, गुजरात और महाराष्ट्र से आए मीसाबंदियों ने भी भाग लिया।

भाषा

हर्ष रवि कांत