बिलासपुर, छह अप्रैल (भाषा) छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के पुत्र अमित जोगी को कड़ी फटकार लगाते हुए उन पर बहुचर्चित राम अवतार जग्गी हत्या मामले की कार्यवाही को रोकने के लिए ‘‘जानबूझकर देरी करने की रणनीति’’ अपनाने का आरोप लगाया है।
उच्च न्यायालय ने अमित जोगी को 2003 में जग्गी की हत्या की साजिश रचने का दोषी ठहराया। उसके 75 पृष्ठ के फैसले से पता चलता है कि आरोपी ने न्याय में विलंब करने के लिए किस तरह कानूनी व्यवस्था को चरम सीमा तक धकेलने का प्रयास किया।
अदालत द्वारा दो अप्रैल को पारित आदेश की प्रति सोमवार को उपलब्ध कराई गई।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा की खंडपीठ ने फैसले में कहा कि वकीलों को बार-बार बदलना और स्थगन के लिए ‘‘यंत्रवत’’ अनुरोध करना उस मामले को आगे बढ़ाने में बाधा डालने की स्पष्ट कोशिश थी जिसे उच्चतम न्यायालय ने शीघ्र निस्तारण के लिए वापस भेजा था।
पीठ ने चिंता जताते हुए कहा कि पर्याप्त समय दिए जाने के बावजूद अमित जोगी की ओर से पेश वकीलों की टीम ने एक ही आधार पर चार सप्ताह के स्थगन की बार-बार मांग की।
अधिवक्ता शैलेंद्र शुक्ल को 25 मार्च, 2026 को मामले का पूरा रिकॉर्ड (पेपर बुक) उपलब्ध करा दिया गया था, लेकिन बाद में उन्होंने यह कहते हुए खुद को अलग कर लिया कि उनके मुवक्किल ने उन्हें उसका वकालतनामा दाखिल करने से ‘‘रोक दिया’’ था।
इसके बाद नये अधिवक्ता विकास वालिया एक अप्रैल एवं फिर दो अप्रैल को पेश हुए और ‘‘विस्तृत’’ रिकॉर्ड का अध्ययन करने के लिए और समय मांगा।
अदालत ने कहा, ‘‘…जब आरोपी अमित जोगी की ओर से पेश अधिवक्ता को दलीलें शुरू करने के लिए कहा गया तो वालिया ने अपनी दलीलें शुरू करने का जरा सा भी प्रयास भी नहीं किया और केवल इतना ही कहा कि उन्हें जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय चाहिए।’’
उसने कहा, ‘‘वकील का आचरण यह दर्शाता है कि उन्हें इन मामलों में केवल कार्यवाही स्थगित कराने और किसी भी तरह से कार्यवाही को रोकने के लिए पेश किया गया है…।’’
उच्च न्यायालय ने यह भी सवाल किया कि किसी पक्ष की ओर से पेश अधिवक्ता मुवक्किल के निर्देश पर मामले से अचानक कैसे अलग हो सकता है और उसके बाद दूसरा अधिवक्ता वकालतनामा दाखिल कर फिर स्थगन कैसे मांग सकता है, खासकर तब जब शीर्ष अदालत द्वारा मामला वापस भेजे जाने के बाद मामला करीब पांच महीने से लंबित है।
आदेश में कहा गया, ‘‘आरोपी का ऐसा आचरण कार्यवाही में देरी करने की सोची-समझी कोशिश प्रतीत होता है जिसे यह अदालत स्वीकार नहीं कर सकती।’’
पीठ ने कोई भी और राहत देने से इनकार करते हुए कहा, ‘‘यदि किसी मामले का एक पक्ष जानबूझकर देरी की रणनीति अपनाने की कोशिश कर रहा है तो यह अदालत असहाय होकर मूक दर्शक बनकर नहीं बैठ सकती। अदालत उचित और समयबद्ध न्याय सुनिश्चित करने के अपने दायित्व से मुंह नहीं मोड़ सकती।’’
उसने कहा कि छह नवंबर 2025 को उच्चतम न्यायालय द्वारा वापस भेजे जाने के बाद से यह मामला करीब पांच महीने से लंबित था और आरोपी मामले की हर प्रगति से भलीभांति परिचित था।
पीठ ने 2021 के उच्चतम न्यायालय के एक फैसले का हवाला दिया, जिसमें चेताया गया था कि ‘‘स्थगन का काम अक्सर न्याय की हत्या के लिए किया जाता है’’ और बार-बार की देरी कानून के शासन में आम आदमी के भरोसे को डिगा देती है तथा ‘‘वादियों की कमर तोड़ देती है।’’
भाषा
सिम्मी माधव
माधव