नयी दिल्ली, एक जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि गुजरात नगर निकाय चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के लिए चुनावी हलफनामे में केवल अपनी ही नहीं बल्कि अपने जीवनसाथी की संपत्तियों का भी विवरण देना अनिवार्य है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि संज्ञान लेने के चरण में यदि मजिस्ट्रेट किसी गलत वैधानिक प्रावधान का उल्लेख कर देता है, तो यह एक सुधार योग्य त्रुटि है और इससे स्वतः ही आपराधिक कार्यवाही अमान्य नहीं हो जाती।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन.के. सिंह की पीठ ने ये निर्देश गुजरात की पूर्व नगर पार्षद चंद्रिकाबेन किशोर दफदा की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए दिये। चंद्रिकाबेन ने 2015 के गुजरात नगर निकाय चुनाव के लिए दाखिल अपने नामांकन हलफनामे में अपने पति के स्वामित्व वाली कुछ अचल संपत्तियों का कथित रूप से खुलासा नहीं करने के लिए उनके खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दी थी।
अदालत ने हालांकि आपराधिक मामले को रद्द नहीं किया।
इसके बजाय, न्यायालय ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (आरपीए) की धारा 125ए के तहत संज्ञान लेने संबंधी मजिस्ट्रेट के आदेश को निरस्त कर दिया और मामले को उपयुक्त कानूनी प्रावधानों के तहत नए सिरे से संज्ञान लेने तथा कानून के अनुसार आगे की कार्यवाही के लिए निचली अदालत को वापस भेज दिया।
पीठ की ओर से फैसला लिखते हुए न्यायमूर्ति करोल ने कहा कि उन्होंने आरोपों के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है।
पीठ ने वर्ष 2005 में संशोधित गुजरात नगरपालिका (निर्वाचन संचालन) नियम, 1994 का उल्लेख करते हुए कहा, “उपरोक्त प्रावधानों के मद्देनजर अपीलकर्ता (दफदा) को अपने जीवनसाथी के स्वामित्व वाली संपत्तियों का भी खुलासा करना चाहिए था।’’
यह मामला एक निजी शिकायत से सामने आया था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि अपीलकर्ता ने अपने नामांकन पत्रों के साथ दाखिल किए गए अनिवार्य हलफनामे में अपने पति के नाम पर दर्ज कई भूखंडों का खुलासा नहीं किया था।
मजिस्ट्रेट ने 2017 में आरपीए की धारा 125ए के तहत समन जारी किया था और गुजरात उच्च न्यायालय ने इन कार्यवाहियों में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था।
शीर्ष अदालत के समक्ष यह दलील दी गई कि आरपीए केवल संसद और राज्य विधानसभाओं के चुनावों पर लागू होता है और नगर निकाय चुनावों पर नहीं।
हालांकि, संज्ञान के प्रश्न पर, पीठ ने अपीलकर्ता की इस दलील को स्वीकार किया कि आरपीए की धारा 125ए को नगर निकाय चुनावों के लिए लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि अधिनियम के तहत ‘‘चुनाव’’ की परिभाषा केवल संसद और राज्य विधानसभाओं के चुनावों तक सीमित है।
अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट द्वारा गलत वैधानिक प्रावधान का उल्लेख करने की त्रुटि से आपराधिक कार्यवाही अमान्य नहीं हो जाती।
पीठ ने मामले को मजिस्ट्रेट के पास यह निर्देश देते हुए वापस भेज दिया ताकि वह उपयुक्त कानूनी प्रावधानों के तहत संज्ञान के प्रश्न पर पुनर्विचार कर कानून के अनुसार आगे की कार्यवाही कर सकें।
भाषा
देवेंद्र अविनाश
अविनाश