वंदे मातरम को कानूनी संरक्षण मिला, विवादित इतिहास पर बहस फिर शुरू
वंदे मातरम को कानूनी संरक्षण मिला, विवादित इतिहास पर बहस फिर शुरू
नयी दिल्ली, 30 जुलाई (भाषा) संसद ने ‘राष्ट्र गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026’ को बृहस्पतिवार को पारित कर दिया, जिसमें राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ के गायन के दौरान किसी भी तरह के व्यवधान या उसके अपमान को आपराधिक कृत्य मानते हुए तीन साल तक की सजा का प्रावधान किया गया है।
इसी के साथ एक सदी से अधिक समय से देशभक्ति की भावना को जागृत करने और सियासी विवादों को हवा देने वाले राष्ट्रगीत के इतिहास को लेकर लंबे समय से जारी बहस फिर शुरू हो गई है।
सरकार ने कहा कि यह विधेयक ‘वंदे मातरम’ को कानून के तहत राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के बराबर का दर्जा देता है, क्योंकि इसमें राष्ट्रगान गाने से जानबूझकर रोकने या किसी सभा में इसके गायन में व्यवधान पैदा करने पर लगने वाले दंडात्मक प्रावधानों को राष्ट्रीय गीत पर भी लागू किया गया है। ऐसे अपराधों के लिए तीन साल तक के कारावास या जुर्माने या दोनों सजा का प्रावधान है।
‘राष्ट्र गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026’ को लोकसभा ने द्रमुक समेत विपक्षी दलों के सदस्यों के हंगामे के बीच संक्षिप्त चर्चा के बाद ध्वनिमत से मंजूरी दे दी।
गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने सदन में विधेयक पर हुई संक्षिप्त चर्चा का जवाब देते हुए कहा कि कांग्रेस को अपने 76 साल के शासनकाल में ‘वंदे मातरम’ को उचित सम्मान देना चाहिए था, लेकिन इसके बजाय उसने तुष्टीकरण की राजनीति का सहारा लिया।
इससे पहले, द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) सांसद के कनिमोई ने विधेयक के खिलाफ कड़ा विरोध दर्ज कराया और आरोप लगाया कि सरकार इसके जरिये “हिंदुत्व के एजेंडे” को राष्ट्रीयता के रूप में पेश कर रही है।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सांसद संबित पात्रा ने कहा कि कांग्रेस ने अपने 76 साल के शासनकाल में ‘वंदे मातरम’ को वह सम्मान नहीं दिया, जिसका राष्ट्रगीत के तौर पर वह हकदार था।
राष्ट्रगीत को लेकर समय-समय पर तीखी बहस होती रही है-खासकर इसके “धर्मनिरपेक्ष” या “इस्लाम-विरोधी” स्वरूप और आजादी की लड़ाई में इसकी भूमिका को लेकर।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले साल नवंबर में कहा था कि 1937 में राष्ट्रगीत के अहम हिस्सों को हटा दिया गया था, जिससे बंटवारे की नींव पड़ी। उन्होंने कहा था कि ऐसी “विभाजनकारी सोच” आज भी देश के लिए एक चुनौती है।
बंगाली उपन्यासकार-कवि बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1875 में ‘वंदे मातरम’ की रचना की थी, जिसमें मातृभूमि को देवी काली के रूप में दर्शाया गया है। यह रचना तब से ही कई बार राजनीतिक विवादों के केंद्र में रही है।
‘वंदे मातरम’ को सबसे पहले 1882 में साहित्यिक पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में चटर्जी के उपन्यास ‘आनंदमठ’ के हिस्से के तौर पर प्रकाशित किया गया था। सदी के आखिर तक यह ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ विद्रोह का नारा बन गया, जिसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राष्ट्रवादी नेताओं ने लोकप्रिय बनाया।
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के 1953 के एक प्रकाशन के मुताबिक, ‘वंदे मातरम’ पहली बार 1896 में किसी राजनीतिक कार्यक्रम (भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन) के दौरान गाया गया था और इसे रवींद्रनाथ टैगोर ने संगीतबद्ध किया था।
1900 के दशक की शुरुआत में बंगाल में विभाजन-विरोधी आंदोलन के जोर पकड़ने के साथ ‘वंदे मातरम’ ने धीरे-धीरे राष्ट्रगीत का रूप ले लिया। उन्हीं दिनों मुस्लिम नेताओं ने ‘वंदे मातरम’ के सार्वजनिक गायन का विरोध शुरू किया था।
‘वंदे मातरम’ के मूल संस्करण में छह छंद हैं। इसके बाद के हिस्सों में देवी दुर्गा और लक्ष्मी की स्तुति और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने वाले सशक्त धार्मिक भाव हैं।
अमृतसर में 30 दिसंबर 1908 को आयोजित ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के दूसरे सत्र में अपने अध्यक्षीय भाषण में सैयद अली इमाम ने कहा था कि जब “भारत का सबसे विकसित प्रांत ‘वंदे मातरम’ के सांप्रदायिक नारे को राष्ट्रीय नारे के तौर पर पेश करता है”, तो उनका “दिल निराशा और मायूसी से भर जाता है।”
उन्होंने कहा था, “…और यह शक कि भारत में राष्ट्रवाद की आड़ में हिंदू राष्ट्रवाद का प्रचार-प्रसार किया जाता है, एक पक्के यकीन में बदल जाता है।”
‘वंदे मातरम’ खासतौर पर इसके शुरुआती दो शब्द धीरे-धीरे राष्ट्रवादी आंदोलन का नारा बन गए।
उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता एजी नूरानी ने 1973 में मुंबई के एक महानगरपालिका स्कूल में राष्ट्रगीत गाए जाने पर उठी आपत्तियों के बाद ‘इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली’ में एक लेख लिखा था।
लेख के मुताबिक, मुस्लिम लीग ने 1937 में लखनऊ में हुए अपने 25वें अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित कर ‘वंदे मातरम’ को न केवल “पूरी तरह से इस्लाम-विरोधी और मूर्ति-पूजा को बढ़ावा देने वाला” बताया था, बल्कि यह भी कहा था कि यह “भारत में सच्चे राष्ट्रवाद के प्रसार को नुकसान पहुंचाने वाला” है।
कुछ दिनों बाद 26 अक्टूबर 1937 को कलकत्ता में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में हुई कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में इस विषय पर एक प्रस्ताव पारित किया गया।
प्रस्ताव में कहा गया, “जब भी राष्ट्रीय सभाओं में ‘वंदे मातरम’ का गायन किया जाए, तो केवल इसके शुरुआती दो छंद ही गाए जाने चाहिए; साथ ही आयोजकों को पूरी आजादी होगी कि वे ‘वंदे मातरम’ के साथ या उसकी जगह कोई दूसरा ऐसा गीत गा सकें, जिस पर कोई आपत्ति न हो।”
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने माना था कि ‘वंदे मातरम’ ने उन्हें “मंत्रमुग्ध कर दिया”, लेकिन उन्हें कभी ऐसा नहीं लगा कि यह “कोई हिंदू गीत है या सिर्फ हिंदुओं के लिए है।”
आजादी के बाद भी महात्मा गांधी ने ‘वंदे मातरम’ को अनिवार्य रूप से लागू किए जाने का विरोध किया था। नूरानी के अनुसार, 23 अगस्त 1947 को अलीपुर में महात्मा गांधी ने कहा था, “इसमें कोई संदेह नहीं कि हर कार्य… दोनों पक्षों में से किसी की भी ओर से भी पूरी तरह स्वेच्छा से होना चाहिए।”
हालांकि, अगले आठ दशक में राष्ट्रगीत के गायन को लेकर बार-बार विवाद उठता रहा।
एक बड़ा विवाद 2009 में हुआ, जब उत्तर प्रदेश के देवबंद में जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने एक फतवा जारी कर मुसलमानों से राष्ट्रगीत न गाने के लिए कहा।
जमीयत उलेमा-ए-हिंद का कड़ा विरोध करते हुए 100 से ज्यादा मुस्लिम विद्वानों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, कलाकारों और लेखकों ने एक बयान में कहा था कि ‘वंदे मातरम’ पर बहस 1930 के दशक में ही जमीयत के तत्कालीन नेतृत्व की सहमति से सुलझा ली गई थी।
बयान में कहा गया था, “हम इस समय ‘वंदे मातरम’ को लेकर बेवजह विवाद खड़ा करने के जमीयत के कदम की कड़ी निंदा करते हैं।”
मुंबई में 1973 में महानगरपालिका स्कूल में राष्ट्रगीत गाने का मामला 2017 में फिर से उठा, जब भाजपा पार्षद संदीप पटेल ने बीएमसी (बृहन्मुंबई महानगरपालिका) के स्कूलों में ‘वंदे मातरम’ के गायन को अनिवार्य करने का प्रस्ताव रखा।
साल 2018 में तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कांग्रेस को देश के बंटवारे के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए आरोप लगाया था कि पार्टी तुष्टीकरण की राजनीति के आगे झुक गई थी।
भाषा पारुल सुरेश
सुरेश

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