मुंबई, 24 जनवरी (भाषा) भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने शनिवार को कहा कि उच्च न्यायालयों को कानून के शासन में व्यवस्थागत विफलताओं को लेकर अधिक सतर्क और सक्रिय रहने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा, “न्याय में देरी न केवल न्याय से इनकार है, बल्कि न्याय का विनाश है।”
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने मध्यस्थता और सुलह के तंत्र को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर भी बल दिया।
प्रधान न्यायाधीश ने यहां दो कार्यक्रमों में अपने विचार रखे। उन्होंने फली नरीमन स्मृति व्याख्यान में बोलने के बाद बंबई उच्च न्यायालय की ओर से आयोजित अभिनंदन कार्यक्रम को संबोधित किया।
फली नरीमन स्मृति व्याख्यान में अपने संबोधन में प्रधान न्यायाधीश ने उच्च न्यायालयों से कानून के शासन में व्यवस्थागत विफलताओं को लेकर अधिक सतर्क और सक्रिय रहने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय ऐसे मामलों में अपने दरवाजे पर दस्तक दिए जाने का इंतजार न करें।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, ‘‘न्याय की सुलभता को राज्य की ओर से गारंटीकृत सेवा के स्वत: प्रदत्त अधिकार (पैसिव राइट) में बदलना हमारा लक्ष्य होना चाहिए। न्याय में देरी न केवल न्याय से इनकार है, बल्कि न्याय का विनाश है।’’
बंबई उच्च न्यायालय की ओर से आयोजित अभिनंदन कार्यक्रम में प्रधान न्यायाधीश ने अदालत कक्ष से परे विवादों के समाधान की व्यवस्था को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
उन्होंने कहा, ‘‘न्याय का भविष्य न केवल विवादों के कुशल निपटारे पर, बल्कि उन्हें बुद्धिमत्तापूर्वक सुलझाने पर भी निर्भर करता है। मध्यस्थता और सुलह केवल सुविधा के विकल्प नहीं हैं, बल्कि परिपक्व न्याय के साधन हैं।’’
प्रधान न्यायाधीश ने इस बात पर जोर दिया कि उच्च न्यायालय केवल शीर्ष अदालत तक पहुंचने का माध्यम नहीं हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘उच्च न्यायालय आम नागरिक की दहलीज की रक्षा करने वाले प्राथमिक प्रहरी हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि कानून का शासन कोई दूर की अवधारणा नहीं, बल्कि एक स्थानीय और जीवंत वास्तविकता है।’’
भाषा संतोष पारुल
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