मुंबई, 22 जनवरी (भाषा) मुंबई की एक सत्र अदालत ने एक मजिस्ट्रेट को कड़ी फटकार लगाते हुए कारण बताओ नोटिस जारी किया है, क्योंकि उन्होंने जमानत मिलने के बावजूद एक व्यक्ति को रिहा नहीं किया था।
सत्र अदालत ने मजिस्ट्रेट के इस रवैये को ‘‘स्पष्ट अवज्ञा’’ करार दिया है।
सत्र न्यायाधीश मुजिबुदीन समदसाब शेख ने व्यक्ति की रिहाई में देरी को ‘‘अवैध हिरासत’’ करार दिया और उसे तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया। अदालत के सात जनवरी के निर्देश का विवरण बृहस्पतिवार को उपलब्ध हुआ।
परक्राम्य लिखत (निगोसिएबल इंस्ट्रूमेंट्स) अधिनियम के तहत एक मामले में आरोपी गणेश त्रिभुवन को सत्र अदालत ने दो जनवरी को जमानत दी थी।
इसके पांच दिन बाद, उनके वकील ने अदालत से हस्तक्षेप का अनुरोध करते हुए कहा था कि त्रिभुवन को रिहा नहीं किया गया है।
सत्र अदालत के सात जनवरी के रोजनामा के अनुसार, न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (कुर्ला) संतोष गारड ने छह जनवरी को रिहाई पत्र जारी किया था।
हालांकि, बाद में मजिस्ट्रेट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए आदेश पारित किया और अपने ही आदेश को ‘‘कानून की दृष्टि में…अनधिकृत और अमान्य’’ घोषित कर उसे वापस ले लिया।
सत्र अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने यह भी निर्देश दिया था कि ‘‘स्पष्ट न्यायिक आदेश के बिना’’ कोई रिहाई पत्र जारी नहीं किया जाएगा।
मजिस्ट्रेट के इस ‘‘अजीबोगरीब’’ रवैये की कड़ी आलोचना करते हुए सत्र न्यायाधीश ने कहा कि ‘‘न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी का आदेश स्पष्ट रूप से अवैध और गैरकानूनी है।’’
सत्र अदालत ने कहा कि जमानत की शर्तें पूरी करने के बावजूद आरोपी हिरासत में रहा, जिससे ‘‘अवैध हिरासत’’ की स्थिति उत्पन्न हुई।
सत्र अदालत ने अपने कार्यालय को आरोपी की रिहाई का आदेश ‘‘तत्काल’’ जारी करने का निर्देश दिया। साथ ही, न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (कुर्ला) को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया, जिसमें यह स्पष्टीकरण मांगा गया है कि अवज्ञा और इसके परिणामस्वरूप अवैध हिरासत के लिए अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की जानी चाहिए।
भाषा सुभाष माधव
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