देखिए सुसनेर विधानसभा सीट के विधायकजी का रिपोर्ट कार्ड

Reported By: Shahnawaz Sadique, Edited By: Shahnawaz Sadique

Published on 22 Oct 2018 04:48 PM, Updated On 22 Oct 2018 04:48 PM

आगर मालवा। विधायकजी का रिपोर्ट कार्ड में आज बारी है मध्यप्रदेश के सुसनेर विधानसभा सीट की। आगर मालवा जिले में आने वाली इस सीट के सियासी हालात पर चर्चा करने से पहले हम आपको इस इलाके की कुछ बातें बताते हैं, जिनसे शायद आप समझ सकें कि आखिर क्यों लोग सियासत और सियासतदानों पर भरोसा नहीं कर पाते हैं।

बीते कुछ सालों में सुसनेर के किसानों ने संतरे की खेती कर मध्यप्रदेश सहित पूरे देश में नई पहचान बनाई है। यहां के संतरे की मिठास नागपुर के संतरे से भी ज्यादा होती है, जिसकी वजह से यहां के अधिकतर किसान परंपरागत फसल को छोड़कर अब संतरे की खेती करने लगे हैं। इसे खरीदने बांग्लादेश से व्यापारी सुसनेर आते हैं, लेकिन केंद्र सरकार के संतरे की एक्सपोर्ट ड्यूटी में दो फीसदी की बढ़ोत्तरी करने के बाद यहां के किसानों को खरीदार नहीं मिल रहे हैं। वहीं राज्य सरकार ने भी फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगाने की घोषणा की थी जो अब तक नहीं लग पाई है। लिहाजा किसानों को भारी नुकसान हो रहा है और वे संतरा फेंकने के लिए मजबूर हैं। जाहिर है आने वाले चुनाव में नेताओं को इन किसानों के सवालों का जवाब देना इतना आसाना नहीं होगा।

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ऐसा नहीं है कि केवल किसानों का मुद्दा ही आने वाले चुनाव में गूंजेगा बल्कि सुसनेर विधानसभा में बुनियादी सुविधाओँ का अभाव भी चुनाव में नेताओं की परीक्षा लेने वाला है। शहरी क्षेत्रों के अलावा ग्रामीण इलाकों में भी पेयजल के लिए लोगों को भटकना पड़ता है। नलखेड़ा के पास कालीसिंध नदी पर कोंडलिया डैम बनाने की योजना 2018 तक खत्म हो जानी चाहिए थी, जिसका काम अब तक पूरा नहीं हो पाया है। इस डैम से 186 गांवों को फायदा होता। यहां स्वास्थ्ये सेवाओं का भी बुरा हाल है, सोयत, सुसनेर और नलखेड़ा जैसे शहरी इलाकों में सरकारी अस्पताल तो हैं लेकिन डॉक्टरों की कमी के कारण मरीजों को राजस्थान के झालावाड़ ले जाना पड़ता है। वहीं भ्रष्टाचार भी आगामी चुनाव में बड़ा मुद्दा बनेगा।

किसान और व्यापारी दोनों ही इस विधानसभा की बड़ी ताकत है, लेकिन मौजूदा हालात में दोनों ही नाराज है। क्योंकि एक तरफ को किसानों और उनकी लागत का मूल्य नहीं मिल रहा है तो दूसरी और व्यापारी और आम मतदाता बुनियादी सुविधा के लिए तरस रहा है।

सुसनेर विधानसभा सीट पर वर्तमान विधायक मुरलीधर पाटीदार ने अपनी चुनावी तैयारियां शुरू कर दी है लेकिन जातिगत समीकरण और सीट के इतिहास को देखते हुए। बीजेपी में कई दावेदारों को लगता है कि उन्हें इस बार मौका मिल सकता है। वहीं कांग्रेस में पिछले बार चुनाव हारने वाले वल्लभ अंबावतिया के अलावा दूसरे दावेदार भी टिकट की रेस में शामिल हैं। इनका जन संपर्क भी शुरू हो गया है।

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सुसनेर विधानसभा में फिलहाल बीजेपी का कब्जा है और मुरलीधर पाटीदार यहां से विधायक हैं। मुरलीधर पाटीदार का कोई राजनीतिक बैकग्राउंड नहीं है। वे मध्यप्रदेश अध्यापक संघ के अध्यक्ष थे और 2013 के विधानसभा चुनाव में अध्यापक संघ के आंदोलन के बाद सीएम शिवराज ने उन्हें बीजेपी से दिया। जबकि टिकट की रेस में 2008 में चुनाव जीतने वाले संतोष जोशी का नाम सबसे आगे था। लेकिन ऐन चुनाव से पहले बीजेपी ने संतोष जोशी का टिकट काटकर मुरलीधर पाटीदार को टिकट दिया। पार्टी की सुरक्षित सीट और पादीदार बाहुल्य इलाका होने के कारण मुरलीधर पाटीदार यहां से चुनाव जीत गए। लेकिन इस बार समीकरण कुछ अलग है। सौधिया ठाकुर समाज के लोग अपने प्रतिनिधि को टिकट देने की मांग कर रहे हैं।  इस लिस्ट में सुसनेर कृषि उपज मडी के अध्यक्ष लक्ष्मण सिंह कांवल का नाम सबसे आगे है। लंबे समय से बीजेपी से जुड़े कांवल का भी कहना है कि सौधिया समाज को मौका मिलना चाहिए।

इस लिस्ट में दूसरा नाम है बीजेपी के जिलाध्यक्ष दिलीप सकलेचा का। सकलेचा नलखेड़ा के रहने वाले है और शुरुआत से ही RSS के कार्यकर्ता के तौर पर काम करते आए है, लिहाजा, सकलेचा को उम्मीद है कि सभी समीकरण सही रहे तो किसी OBC उम्मीदवार की बजाय पार्टी सामान्य वर्ग पर भरोसा कर सकती है। हालांकि, सकलेचा अपनी दावेदारी खुल कर नहीं कर रहे है। वहीं मौजूदा विधायक मुरलीधर पाटीदार को भी पूरा विश्वास है कि पार्टी एक बार फिर से उन्हें मौका देगी।

कांग्रेस के संभावित दावेदारों की बात की जाए तो गिरीराज अंबावतिया और लाला बलराम सिंह का नाम सबसे उपर है। गिरीराज अंबावतिया पाटीदार समाज से हैं। पूर्व ऊर्जा मंत्री हुकूमसिंह कराड़ा के पीए रहे गिरीराज ने शाजापुर जिले से अलग होने के बाद बने आगर मालवा जिले में अपनी पैठ को पिछले कुछ सालों में बढ़ाया है। पाटीदार समाज से होने के नाते गिरीराज को उम्मीद है कि कांग्रेस उन्हें मौका दे सकती है।

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सुसनेर में पाटीदार और सौधिया ठाकुर के अलावा राजपूत समाज का भी दबदबा है। यही वजह है कि राजपूत समाज से आने वाले लाल बलराम सिंह भी कांग्रेस से टिकट की मांग की है। लाला बलराम सिंह बड़े किसान होने के साथ ही अपेक्स बैक के चैयरमेन भी रहे हैं और दिग्विजय सिंह के खास माने जाते है, लिहाजाअपनी दावेदारी को मजबूत करने के लिए लाला बलराम सिंह ने जमकर तैयारियां शुरू कर दी हैं। सुसनेर विधानसभा सीट राजगढ़ लोकसभा सीट के अंतर्गत आती है और इस सीट पर पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का सिक्का चलता है। लेकिन अब कमलनाथ के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद यहां समीकरण जरूर बदल सकते हैं।

सुसनेर के सियासी इतिहास की बात की जाए तो ये सीट शुरू से ही बीजेपी का मजबूत गढ़ रहा है। सुसनेर विधानसभा सीट पर 1998 के विधानसभा चुनाव के बाद से कोई भी कांग्रेसी नेता यहां से नहीं जीता है। इस सीट के बारे में एक दिलचस्प बात ये भी है कि यहां हर बार चुनाव जीतने के बाद भी बीजेपी अपने प्रत्याशी को बदल देती है। वैसे पाटीदार बाहुल्य इस इलाके में जाति समीकरण भी चुनावी नतीजों को खासा प्रभावित करता है।

सुसनेर विधानसभा सीट का प्रदेश की राजनीति में खास मुकाम होने के साथ ही धार्मिक तौर पर भी खासा महत्व रखता है। नलखेड़ा में मां पीतांबरा शक्ति पीठ का प्राचीन मंदिर है। यहां विराजी मां बगलामुखी के आशीर्वाद से कई राजनेता विधानसभा पहुंचे हैं। सुसनेर विधानसभा सीट को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की प्रयोगशाला भी माना जाता है। दरअसल चुनाव जीतने के बाद भी यहां हर बार बीजेपी का प्रत्याशी बदल दिया जाता है। पूरी तरह से ग्रामीण परिवेश वाली इस विधानसभा सीट में चार नगर पंचायत क्षेत्र सुसनेर, नलखेड़ा, सोयत और बड़ागांव आते हैं। पिछले तीन विधानसभा चुनावों में यहां बीजेपी के प्रत्याशी ही चुनाव जीत रहे हैं। 2003 में यहां से बीजेपी के फूलचंद वेदिया चुनाव जीते। 2008 के चुनाव में संतोष जोशी बीजेपी की टिकट पर चुनाव जीते। जबकि 2013 में सभी समीकरणों से अलग अध्यापक संघ के प्रदेश अध्यक्ष रहे मुरलीधर पाटीदार बीजेपी के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे। इस चुनाव में मुरलीधर ने कांग्रेस के वल्लभाई अंबवतिया को शिकस्त दी।इस चुनाव में बीजेपी को जहां 79018 वोट मिले। जबकि कांग्रेस को 51342 वोट मिले। इस तरह जीत का अंतर 27676 वोटों का रहा।

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20 लाख 88 हजार मतदाता वाले सुसनेर विधानसभा सीट के जातिगत समीकरण की बात की जाए तो यहां सौधिया ठाकुऱ, राजपूत, पाटीदार,गुर्जर और वैश्य मतदाता बड़ी ताकत हैं। इसमें सबसे ज्यादा 40 हजार सौधिया ठाकुर मतदाता हैं। वहीं पाटीदार और राजपूत वोटरों का भी दबदबा है। हालांकि, मराठी उम्मीदवार भी विधायक रह चुके हैं। कुल मिलाकर इस बार भी सुसनेर की सियासत में दिलचस्प घमासान होने के पूरे आसार हैं।

वेब डेस्क, IBC24

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