शह मात The Big Debate: मुफ्त की रेवड़ी हो मना.. फ्रीबीज पर दिखाया आईना! चुनावी चक्कर में खजाने का बंटाधार! फ्रीबीज पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के मयाने क्या?

मुफ्त की रेवड़ी हो मना.. फ्रीबीज पर दिखाया आईना! चुनावी चक्कर में खजाने का बंटाधार! Supreme Court on freebies

शह मात The Big Debate: मुफ्त की रेवड़ी हो मना.. फ्रीबीज पर दिखाया आईना! चुनावी चक्कर में खजाने का बंटाधार! फ्रीबीज पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के मयाने क्या?

Supreme Court on Freebies || Image- NextIAS file

Modified Date: February 19, 2026 / 11:50 pm IST
Published Date: February 19, 2026 11:45 pm IST

रायपुरः Supreme Court on freebies देश की सुप्रीम अदालत ने एक बार फिर मुफ्त वाले लाभ पर टिप्पणी की है। देश-प्रदेश में इस पर सियासी बहस गर्मा गई है। कोर्ट ने कहा है कि फ्रीबीज की जगह सुनियोजित योजनाएं लाई जानी चाहिए, लेकिन जीत की गारंटी बनी फ्री वाली योजनाओं को बंद करने का साहस क्या कोई पार्टी कर सकेगी? विपक्ष का आरोप है कि बीजेपी ने इन्हें प्रमोट किया लेकिन क्या वो खुद चुनाव में इस तरह की योजनाओं का मोह छोड़ पाए हैं? क्या ये टिप्पणी और सुनवाई इन योजनाओं को बंद करने की तैयारी है?

Supreme Court on freebies देश में फ्रीबीज यानि मुफ्त की रेवड़ी को लेकर बहस फिर गर्माई है। दरअसल मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि दलों और सरकारों को मुफ्त योजनाओं की जगह सुनियोजित योजनाएं लागू करनी चाहिए। फ्रीबीज से विकास बाधित हो सकता है, कोर्ट ने सीधे-सीधे पूछा है कि जो राज्य राजस्व घाटे में हैं वो मुफ्त की योजनाओं को कैसे चला पा रहे हैं। कोर्ट ने फिक्र जताते हुए कहा कि ये पैसा जनता के टैक्स का है। सरकारों को कुछ ठोस करना होगा। मु्द्दा पूरी तरह से सियासी है सो इस पर रिएक्शन भी पक्षों के हिसाब से ही आए हैं। सत्ता पक्ष कोर्ट की टिप्पणी को सही बताते हुए चर्चा की बात कहता है तो विपक्ष इसे सत्तापक्ष का सियासी हथियार बता रहा है।

ये सच है कि फ्री-बीज खासकर चुनाव के वक्त किसी वर्ग विशेष को टार्गेट तक उन्हें सीधे रूपयों, नौकरी या भत्ते का लाभ देने का ऐलान सत्ता तक पहुंचा सकता है इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हालिया दौर में हुए चुनावों के रिजल्ट में दिखा है। सवाल ये है कि जब लोग मानते हैं, सरकारें जानती हैं, विपक्ष स्वीकार करता है कि फ्री-बीज का लालच देश की आर्थिक सेहत और भविष्य बिगाड़ रहा है तो फिर इसे बंद करने पर एकमत क्यों नहीं होते? क्या बिना फ्री-बीज के चुनाव नतीजे प्रभावित करने का जोखिम लेने की हिम्मत दल जुटा पाएंगे?

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सवाल आपका है.. पत्रकारिता के माध्यम से जनसरोकारों और आप से जुड़े मुद्दों को सीधे सरकार के संज्ञान में लाना मेरा ध्येय है। विभिन्न मीडिया संस्थानों में 10 साल का अनुभव मुझे इस काम के लिए और प्रेरित करता है। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय से इलेक्ट्रानिक मीडिया और भाषा विज्ञान में ली हुई स्नातकोत्तर की दोनों डिग्रियां अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ने के लिए गति देती है।