‘आतंकी’ गतिविधियों के लिए ‘नव-सामाजिक’ आंदोलन पीएफआई पर कड़ी नजर |

‘आतंकी’ गतिविधियों के लिए ‘नव-सामाजिक’ आंदोलन पीएफआई पर कड़ी नजर

‘आतंकी’ गतिविधियों के लिए ‘नव-सामाजिक’ आंदोलन पीएफआई पर कड़ी नजर

: , September 22, 2022 / 04:45 PM IST

तिरुवनंतपुरम, 22 सितंबर (भाषा) केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक के तीन समान विचारधारा वाले संगठनों के नेताओं ने 2006 में एक साथ बैठकर मुस्लिम समुदाय को उनके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पिछड़ेपन के मद्देनजर से सशक्त बनाने के लिए अखिल भारतीय संगठन बनाने की आवश्यकता पर चर्चा की।

केरल के मलप्पुरम जिले के मंजेरी में हुई बैठक में लिये गये निर्णय के आधार पर केरल के राष्ट्रीय विकास मोर्चा (एनडीएफ), तमिलनाडु के मनिथा नीति पासराय और कर्नाटक फोरम फॉर डिग्निटी के नेता कुछ महीने बाद बेंगलुरु में इकट्ठे हुए और तीनों संगठनों के विलय की घोषणा की, जिसके परिणामस्वरूप पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) का उदय हुआ।

सोलह साल बाद राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने बृहस्पतिवार को 11 राज्यों में पीएफआई कार्यकर्ताओं पर छापे मारे और उनमें से कई को कथित तौर पर आतंकी गतिविधियों के लिए हिरासत में लिया गया। अधिकारियों ने इस छापे को ‘अब तक की सबसे बड़ी’ कार्रवाई घोषित किया है। इस बीच संगठन ने ‘असंतुष्टों का मुंह बंद कराने के लिए एजेंसियों के इस्तेमाल को लेकर फासीवादी शासन के कदम’ का विरोध किया।

पीएफआई भारत के वंचित वर्गों के सशक्तीकरण के लिए एक नव-सामाजिक आंदोलन के प्रयास का दावा करता है। हालांकि, अक्सर कानून प्रवर्तन एजेंसियां इस संगठन पर कट्टरपंथी इस्लाम को बढ़ावा देने का आरोप लगाती रही हैं।

पीएफआई के पास अब कई सहयोगी संगठन हैं, जिनमें इसकी राजनीतिक शाखा सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई), छात्र शाखा कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया, नेशनल वीमेन्स फ्रंट, रिहैब इंडिया फाउंडेशन नामक एक गैर-सरकारी संगठन और एम्पावर इंडिया फाउंडेशन नामक एक थिंक टैंक शामिल है।

कई विश्लेषकों ने पीएफआई की जड़ें एनडीएफ में होने की बात कही है, जो एक कट्टरपंथी इस्लामी संगठन है, जिसे बाबरी मस्जिद के विध्वंस के परिणामस्वरूप एक साल बाद 1993 में बनाया गया था।

प्रतिबंधित संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) के पूर्व नेताओं द्वारा स्थापित एनडीएफ की गतिविधियों पर 2002 और 2003 में कोझीकोड जिले में हुए सांप्रदायिक दंगों के बाद केरल में व्यापक चर्चा हुई थी, जिसमें दो समुदायों के लोगों की हत्या हुई थी।

हालांकि पीएफआई का गठन देश में मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक उन्नति के लिए प्रयास करने के उद्देश्य से किया गया था, लेकिन संगठन जल्द ही, खासकर 2010 की घटना के बाद सभी गलत कारणों से विभिन्न राज्य और केंद्रीय एजेंसियों के रडार पर आ गया। केरल में कथित तौर पर प्रश्नपत्र के माध्यम से धार्मिक भावनाओं को आहत करने के लिए उस कॉलेज प्रोफेसर का हाथ काट दिया गया था, जिसने प्रश्नपत्र सेट किया था।

पीएफआई से जुड़े कई कार्यकर्ताओं को 2011 की घटना के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था, जिसकी देश में सभी लोकतांत्रिक ताकतों ने निंदा की थी।

यह संगठन केरल में कथित ‘लव जिहाद’ की घटनाओं, अन्य धर्मों के लोगों का जबरन धर्म परिवर्तन और अफगानिस्तान तथा सीरिया में इस्लामिक स्टेट में शामिल होने के लिए राज्य के कुछ लोगों के लापता होने को लेकर विभिन्न एजेंसियों की जांच के दायरे में आया।

हाल के महीनों में केरल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ-भारतीय जनता पार्टी (आरएसएस-भाजपा) नेताओं की हत्या के आरोप में पीएफआई और उसके सहयोगी संगठनों के कार्यकर्ताओं को भी गिरफ्तार किया गया था।

पीएफआई की फंड जुटाने की गतिविधियों की जांच ईडी और आयकर विभाग जैसी केंद्रीय एजेंसियां कर रही हैं।

इन सभी कारणों के लिए दोषी ठहराये जाने के बावजूद, पीएफआई ने अपने एम्पावर इंडिया फाउंडेशन के माध्यम से मुस्लिम समुदाय के उत्थान के अपने मिशन पर अपना ध्यान जारी रखा है। इस संगठन ने 2047 के लिए एक परियोजना दस्तावेज रखा है।

इसके नेताओं का कहना है कि भारत की स्वतंत्रता के 100 साल का जश्न मनाए जाने के वक्त तक देश और मुस्लिम समुदाय को सशक्त बनाने के लिए एक विजन निर्धारित करने और दीर्घकालिक कार्य योजना तैयार करने का विचार है।

इसने परियोजना की तैयारी के हिस्से के रूप में विभिन्न राज्यों में कई राष्ट्रीय संगोष्ठियों और शहर में एक साथ कार्यक्रमों का आयोजन किया था।

भाषा सुरेश अर्पणा

अर्पणा

 

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