राष्ट्रपति ने विकास के मानकों के पुनर्मूल्यांकन पर जोर दिया |

राष्ट्रपति ने विकास के मानकों के पुनर्मूल्यांकन पर जोर दिया

राष्ट्रपति ने विकास के मानकों के पुनर्मूल्यांकन पर जोर दिया

:   Modified Date:  April 24, 2024 / 02:35 PM IST, Published Date : April 24, 2024/2:35 pm IST

देहरादून, 24 अप्रैल (भाषा) राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने बुधवार को विकास के मानकों के पुनर्मूल्यांकन पर जोर देते हुए कहा कि वनों का विनाश करना एक तरह से मानवता का विनाश करना है।

यहां इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी में भारतीय वन सेवा के व्यवसायिक प्रशिक्षण पाठयक्रम के दीक्षांत समारोह को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने कहा, ‘‘ संसाधनों के अरक्षणीय दोहन ने मानवता को ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है जहां विकास के मानकों का पुनर्मूल्यांकन करना होगा।’’

इस संबंध में उन्होंने मानव केंद्रित कालखंड ‘एंथ्रोपोसीन युग’ का जिक्र किया तथा कहा कि हम पृथ्वी के संसाधनों के ‘ओनर नहीं बल्कि ट्रस्टी’ है और इसलिए हमारी प्राथमिकताएं मानव केंद्रित होने के साथ ही प्रकृति क्रेंद्रित होनी चाहिए ।

मुर्मू ने कहा, ‘‘ आज यह समझना जरूरी है कि हम पृथ्वी के संसाधनों के ओनर नहीं है बल्कि ट्रस्टी हैं । हमारी प्राथमिकताएं मानव केंद्रित होने के साथ ही प्रकृति केंद्रित भी होनी चाहिए । वस्तुत: प्रकृति-केंद्रित होकर ही हम सही अर्थों में मानव केंद्रित हो सकेंगे।’’

राष्ट्रपति ने विश्व के कई भागों में वन संसाधनों में बहुत तेजी से क्षति होने पर चिंता जताई और कहा कि वनों का विनाश एक तरह से मानवता का विनाश करना है। उन्होंने इसकी तेजी से क्षतिपूर्ति के लिए विज्ञान और तकनीक की मदद लेने को कहा।

उन्होंने इस संबंध में वनों की क्षतिपूर्ति के लिए अपनाए जा रहे ‘मियावाकी’ तरीके का भी जिक्र किया ।

राष्ट्रपति ने जलवायु परिवर्तन को विश्व समुदाय के सामने खड़ी गंभीर चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि अभी हाल में उच्चतम न्यायालय ने जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से मुक्त होने के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत मौलिक अधिकार का दर्जा दिया है।

कार्यक्रम में मौजूद वन अकादमी के विशेषज्ञों से प्रशिक्षण कार्यक्रम में इस बारे में जरूरी बदलाव करने को कहा। उन्होंने कहा, ‘‘ मैं उनसे अनुरोध करूंगी कि जलवायु की इस आपातकालीन स्थिति को देखते हुए प्रशिक्षण के पाठयक्रम में यथोचित संशोधन करने पर विचार करें।’’

वनों को ‘जीवनदाता’ बताते हुए राष्ट्रपति ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि मानव समाज जंगलों की महत्ता को जानबूझ कर भुलाने की गलती कर रहा है। उन्होंने कहा कि वन एवं वन्यजीवों के संरक्षण और संवर्धन के जरिए मानव जीवन को संकट से बचाया जा सकता है।

उन्होंने नए वन अधिकारियों से जंगलों के संरक्षण, संवर्धन एवं पोषण की जिम्मेदारी को पूरी सजगता और निष्ठा से निभाने को कहा।

मुर्मू ने कहा कि विकास रथ के दो पहिए होते हैं-परंपरा और आधुनिकता, लेकिन आज मानव समाज पारंपरिक ज्ञान की उपेक्षा करने के कारण पर्यावरणीय समस्याओं का दंश झेल रहा है।

इस संबंध में उन्होंने जनजातीय समाज का उदाहरण देते हुए कहा कि उसमें प्रकृति के शाश्वत नियमों को अपने जीवन का आधार बनाया जाता है लेकिन आधुनिकता के आवेग में कुछ लोगों ने जनजाति समुदाय और उनके ज्ञान भंडार को रूढ़िवादी मान लिया है।

उन्होंने कहा, ‘‘ जलवायु परिवर्तन में जनजातीय समाज की भूमिका नहीं है लेकिन उन पर इसके दुष्प्रभाव का बोझ कुछ अधिक ही है। यह महत्वपूर्ण है कि सदियों से जनजाति समाज द्वारा संचित ज्ञान के महत्व को समझा जाए और पर्यावरण को बेहतर बनाने के लिए उसका उपयोग किया जाए ।’’

उन्होंने कहा कि उनका ज्ञान हमें पारिस्थितिक रूप से सतत, नैतिक रूप से वांछनीय और सामाजिक रूप से न्यायसंगत मार्ग पर आगे बढ़ने में हमारी मदद कर सकता है ।

मुर्मू ने कहा कि इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि विकास यात्रा में जनजाति समाज की भी बराबरी की भागीदारी हो।

उन्होने अधिकारियों से कहा कि वे जब अपने कार्यक्षेत्र में जाएं तो जनजाति समाज के लोगों के साथ भी समय बिताएं, उनकी प्रथाओं को सीखें, उनका प्रचार-प्रसार करें और उनके आदर्श बनें। उन्होंने उनसे जनजाति समाज में उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य एवं स्वच्छता के मानकों में सुधार के लिए काम करने को भी कहा।

उन्होंने कहा, ‘‘ आपको आधुनिकता एवं परंपरा का समन्वय करके वन संपदा और लोगों के हितों की रक्षा करनी है। ऐसा करके आप पर्यावरण अनुकूल और समावेशी योगदान दे सकेंगे।’’

उन्होंने कहा कि जब भी आप दुविधा में हों तो संविधान के मूल्यों और भारत के लोगों के हितों को देखकर फैसला लें ।

राष्ट्रपति ने इस बात पर दुख व्यक्त किया कि ब्रिटिश काल के दौरान भारत में 1875 से 1925 तक 50 वर्ष की अवधि में लोगों को प्रलोभन देकर अस्सी हजार से अधिक बाघों, डेढ़ लाख से अधिक तेंदुओं तथा दस लाख से अधिक भेड़ियों का शिकार कराया गया।

उन्होंने कहा कि जब वह ऐसे संग्रहालयों में जाती हैं जहां पशुओं की खाल या उनके कटे सिर दीवारों पर सजाए गए हैं तो उन्हें वे मानव सभ्यता के पतन की कहानी कहते हुए लगते है।

उन्होंने वन अधिकारियों के इस बैच में शामिल दस महिला अधिकारियों को बधाई देते हुए कहा कि वे देश के प्रगतिशील बदलाव की प्रतीक हैं।

भाषा दीप्ति खारी

खारी

 

(इस खबर को IBC24 टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)

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