किसे जिताएंगे दिग्विजय सिंह, कांग्रेस को या बीजेपी को?

IBC-24   Blog By: Sanjeet Tripathi

ये सवाल इसलिए, क्योंकि दुनिया जहान के मुद्दे छोड़कर दिग्विजय सिंह चुनावी मुद्दा बने हुए हैं। वो कांग्रेस के लिए भी अहम हैं और बीजेपी के लिए भी। कांग्रेस के लिए क्यों अहम है, ये चर्चा आगे करेंगे। पहले बात बीजेपी की, बीजेपी मध्यप्रदेश में सत्ता की चौथी पारी खेलने का दावा कर रही है। कहने को तो बीजेपी विकास के मुद्दे को लेकर जनता के बीच जा रही है। पिछले 15 साल में विकास के बड़े-बड़े दावे करने वाली बीजेपी के पास गिनाने को भी बहुत कुछ है।

बीजेपी नेता मोदी और शिवराज सरकार के कामकाज का बखान कर भी रहे है तो फिर ऐसा क्यों हो रहा है कि प्रचार के दौरान पीएम मोदी से लेकर अमित शाह और शिवराज सिंह तक तमाम बीजेपी के नेता और स्टार प्रचारक बड़ी शिद्दत से दिग्वजय सिंह को याद कर रहे है। जबकि फ्रंटफुट पर तो कमलनाथ और सिंधिया खेल रहे है। आखिर क्यों जनता को दिग्विजय के शासनकाल की याद दिलाई जा रही है। क्यों 15 साल पहले का अंधेरे में डूबा प्रदेश लोगों की आंखों में लाया जा रहा है। क्यों जनता को उस समय की उबड़ खाबड़ और जर्जर सड़कों पर चलने के झटके महसूस कराए जा रहे है। आखिर बीजेपी के चुनावी प्रचार में दिग्विजय सिंह क्यों छाए हुए है। बीजेपी ने दिग्विजय सिंह को ही क्यों टारगेट पर लिया है। बीजेपी को किस बात का डर है। वो इतनी असहज क्यों है। क्या बीजेपी को कर्मचारियों और किसानों की नाराजगी का डर है या फिर सवर्णों के गुस्से की दहशत। क्या बीजेपी को एंटी इनकंमबेंसी की डर सता रहा है या फिर कांग्रेस की कथित एकजुटता से वो परेशान है। इससे भी बड़ी बात, क्या बीजेपी संघ और उसके सहयोगी संगठनों की उस कथित सर्वे रिपोर्ट से खौफजदा है जिसमें बीजेपी की हालत खराब बताई जा रही है।

तो क्या इन सभी कारणों के आगे बीजेपी के विकास के दावे कमजोर साबित हो रहे है। तो क्या इसीलिए बीजेपी गड़े मुर्दे उखाड़ रही है। क्या इसीलिए लोगों को दिग्विजय सिंह के कथित कुशासन की याद दिलाई जा रही है। तो क्या बीजेपी एक बार फिर दिग्विजय सिंह के नाम पर अपनी नैया पार लगाने की जुगत में है। शायद इसीलिए बीजेपी की कोई चुनावी सभा ऐसी नहीं जा रही है, जिसमें दिग्विजय सिंह का नाम नहीं लिया जा रहा हो। बीजेपी के करीब-करीब सभी नेता चुनावी मंच पर दिग्विजय सिंह के शासन की याद ताजा कर रहे हैं। 15 साल पहले की जर्जर सड़कों और बिजली को लेकर उन्हें कोस रहे हैं। अपनी सरकार के 15 साल की तुलना दिग्विजय सिंह के कार्यकाल से कर रहे है।

तो सवाल ये है कि क्या इस बार दिग्विजय का नाम बीजेपी को सत्ता के सिंहासन पर पहुंचाएगा। क्या दिग्विजय सिंह की कथित खराब छवि फिर से बीजेपी के लिए तारणहार बनेगी। दरअसल बीजेपी दिग्विजय सिंह को जनता के खलनायक के रूप में प्रस्तुत कर रही है। कुल मिलाकर बीजेपी वोटर्स को अपने पक्ष में करने के लिए हर हथकंडा अपना रही है और इसके लिए वो ढिंढोरे पीट-पीट कर लोगों को दिग्विजय सिंह के कथित कुशासन की पिक्चर दिखा रही है और चौथी बार सत्ता के सिंहासन पर काबिज हो सके।

अब बात करते है कांग्रेस की, तो कांग्रेस भी दिग्विजय सिंह की कथित खराब छवि के चलते उन्हें आगे नहीं रख रही है। दिग्विजय से चुनावी रैलियां कराने से भी परहेज कर रही है। हाल ही में दिग्विजय सिंह का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें पार्टी में हो रही उनकी उपेक्षा का दर्द छलक आया था।  दिग्विजय सिंह इस वीडियो में ये कहते नजर आ रहे थे कि उनके भाषण से कांग्रेस को नुकसान होता है और इसी वजह से वो कोई सभा नहीं करते। मध्यप्रदेश में कांग्रेस के चुनावी अभियान के आगाज के समय जब राहुल गांधी भोपाल आए थे। तो सभी बड़े नेताओं के कटआउट शहर भर में लगे थे लेकिन दिग्विजय सिंह का कटआउट कहीं नजर नहीं आया था।

फिर भी बात मध्यप्रदेश की हो और फिर कांग्रेस की हो तो दिग्विजय सिंह को अंडरस्टीमेट नहीं किया जा सकता। ये बात कांग्रेस का प्रदेश नेतृत्व भी जानता है और पार्टी आलाकमान भी। ये वही दिग्विजय सिंह हैं, जिन्हें कभी कांग्रेस का चाणक्य कहा जाता था। ये वही दिग्विजय सिंह हैं जिन्हें कभी राहुल गांधी के राजनीतिक गुरू की संज्ञा दी गई है। ये वही दिग्विजय सिंह हैं। जिन्हें  कभी राहुल गांधी का सबसे करीबी और अच्छे सलाहकार के रूप में पहचाना जाता था। ये वही दिग्विजय सिंह हैं, जो खरा बोलने, व्यंग्य करने और अपनी बेबाकी के लिए जाने जाते है, वो भी ठोस होमवर्क के साथ। हालांकि दिग्विजय सिंह अपने कई बयानों के कारण विवादों में घिरते आए है.। कई बार तो ऐसे हालात बने कि पार्टी को उनके बयानों से किनारा भी करना पड़ा। तो क्या दिग्विजय सिंह कांग्रेस के संकट मोचक की जगह संकट बन गए हैं। क्या दिग्विजय सिंह कांग्रेस की मजबूरी बने हुए हैं।

दिग्विजय सिंह के पास भले ही कांग्रेस की चुनावी टीम का कोई जिम्मेदारी भरा पद नहीं है। ना ही पार्टी की केंद्रीय और राज्य ईकाई में कोई बड़ा पद उनके पास है। लेकिन उनके प्रभाव और चतुरता का सभी लोहा मानते है। कोई इस बात से इंकार नहीं कर सकता है कि मध्यप्रदेश में उनकी पैठ नहीं है।  कमलनाथ, सिंधिया, सुरेश पचौरी, अरुण यादव, अजय सिंह और कांतिलाल भूरिया के लिए कहा जाता है  कि वे क्षेत्र विशेष में सीमित हैं। लेकिन 10 साल तक एमपी के सीएम रहे दिग्विजय सिंह किसी क्षेत्र में बंधे नहीं है। उनके कौशल और प्रभाव को कांग्रेस भी समझती है और इसीलिए राहुल गांधी ने दिग्विजय सिंह को फ्रंट पर लाने की बजाय एक महत्वपूर्ण काम सौंपा है, जिसे दिग्विजय सिंह बखूबी अंजाम भी दे रहे हैं। दरअसल मध्यप्रदेश कांग्रेस की समन्वय समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्हें कांग्रेस को एकजुट करने का काम दिया गया है।

मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह ही एकमात्र ऐसे नेता हैं, जिनके लोग हर जिले और ब्लॉक में है और वे उन्हें व्यक्तिगत रूप से भी जानते हैं। यही वजह है कि कांग्रेस बागियों के मामले में बीजेपी से कम परेशान है। दिग्विजय सिंह ने अधिकांश सीटों पर बागियों को बैठा दिया है और पार्टी को एकजुट करने में भी काफी हद तक कामयाबी पाई है। दिग्विजय सिंह का ये अभियान टिकट बांटने के पहले से चल रहा है जो अब भी जारी है। पिछले तीन चुनाव में कांग्रेस की हार का बड़ा कारण उसके बिखराव को भी माना जाता है। लेकिन इस बार क्षत्रपों में बंटी कांग्रेस एकजुट नजर आ रही है और जमीनी स्तर पर दिग्विजय सिंह ने भी पार्टी को एक सूत्र में पिरोने का काम किया है। फिलहाल वो फिल्ड की बजाय पीसीसी दफ्तर में ज्यादा नजर आ रहे हैं। रूठों को मना रहे हैं और बागियों को बैठा रहे हैं।

पर्दे के पीछे किया गया दिग्विजय सिंह का ये काम कांग्रेस की ताकत बन सकता है। तो भले ही दिग्विजय सिंह की छवि कथित रूप से खराब है,लेकिन बीजेपी अपने फायदे के लिए उनका नाम इस्तेमाल कर रही है जबकि कांग्रेस प्रचार के काम में भले ही उन्हें पीछे रखा है।लेकिन उनके अनुभव, संपर्क और राजनीतिक कौशल का भरपूर इस्तेमाल कर रही है। फिलहाल प्रदेश में चुनावी प्रचार चरम पर है और दिग्विजय सिंह सुर्खियों में। तो देखने वाली बात ये होगी कि दिग्विजय किसे जिताने में जुटे हैं।  उनके नाम के सहारे बीजेपी सत्ता का चौका लगाएगी या फिर कांग्रेस का 15 साल का वनवास खत्म होगा? 

कैलाश कछावा

सीनियर प्रोड्यूसर, IBC24

Web Title : Blog on MP Assemly Election 2018

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