Chhattisgarh Political Journey: कहानी...'छत्तीसगढ़' में सरकारों के उदय और अवसान की, जानिए 2000 से 2023 तक के सियासी सफर की एक-एक बात | Chhattisgarh ka ba tak siyasi safar 2000 se 2023 tak

Chhattisgarh Political Journey: कहानी…’छत्तीसगढ़’ में सरकारों के उदय और अवसान की, जानिए 2000 से 2023 तक के सियासी सफर की एक-एक बात

Chhattisgarh Political Journey: कहानी...'छत्तीसगढ़' में सरकारों के उदय और अवसान की, जानिए 2000 से 2023 तक के सियासी सफर की एक-एक बात

Edited By :   December 2, 2023 / 01:58 PM IST

रायपुर: Chhattisgarh Political Journey  हम समय के एक ऐसे मोड़ पर आपसे मुखातिब हैं, जब छत्तीसगढ़ नए जनादेश का रिजल्ट जानने के लिए बेताब है। सरकारें बनती हैं..बदलती हैं..लेकिन अपने पीछे छोड़ जाती हैं निशानियां। आज हम 23 साल के युवा छत्तीसगढ़ और यहां की अब तक की तमाम सरकारों के उदय और अवसान का जो सिलसिला है, उसके दिलचस्प सफर की जानकारी दे रहे हैं।

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Chhattisgarh Political Journey  उम्मीदों की घाटियों से उठती रहीं आवाजें..समय के पहाड़ पर छाया रहा धुंधलका..लंबी अनदेखी से पिछड़ता गया कारवां। तब समवेत गूंजा एक स्वर ‘हमर माटी म हमर राज..हमर छत्तीसगढ़’ धरने हुए, आंदोलन चला। छत्तीसगढ़िया मनखे की पुकार आखिर कब तक अनसुनी की जाती। दिल्ली और भोपाल ने ये मान लिया कि हां छत्तीसगढ़ को अपना राज चलाने का हक़ है। पहले मध्यप्रदेश विधानसभा ने पृथक छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण पर अपनी मुहर लगाई, फिर संसद ने हामी भरी और वो ऐतिहासिक पल आया जब भोपाल में छत्तीसगढ़िया विधायकों की विधिवत विदाई हुई। इस तरह बरसों की प्रतीक्षा के बाद साकार हुआ छत्तीसगढ़ के अलग राज्य का सपना।

नए राज्य का जन्म बस होने ही वाला था कि ये भी तय हो गया कि रायपुर में छत्तीसगढ़ की राजधानी बनेगी। आज के दौर में जिसे पहुंना विश्राम गृह के नाम से जाना जाता है उसे ही सीएम हाउस के लिए आरक्षित किया गया था। इसी परिसर में कांग्रेस के तमाम नेता जुटे। प्रभाराव और गुलाब नबी आजाद ऑब्जर्वर बनाकर भेजे गए। शुक्ल बंधुओं के गढ़ में सीएम के चेहरे को लेकर रस्साकशी शुरू हुई। अटल सरकार ने छत्तीसगढ़ राज्य बना दिया। उस वक्त अविभाजित मध्यप्रदेश में दिग्विजय सरकार सत्तासीन थी। यह तो तय था छत्तीसगढ़ में सरकार तो कांग्रेस की बनेगी, तब लेकिन ये तय नहीं था, मुख्यमंत्री कौन होगा? इस कतार में विद्याचरण शुक्ल, श्यामाचरण शुक्ल जैसे वजनदार नाम तो थे ही, साथ ही सत्यनारायण शर्मा, महेंद्र कर्मा, अरविंद नेताम जैसे तमाम नेताओं के नाम भी चर्चा में थे। लेकिन सबको चौंकाते हुए कांग्रेस आलाकमान ने जिस नाम को सीएम के लिए चुना वो था अजीत प्रमोद कुमार जोगी का।

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छत्तीसगढ़ राज्य के बनते ही कांग्रेस की सियासी तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी थी। अब शुक्ल बंधुओं के दबदबे पर हावी था सीएम जोगी का रसूख। ये कुछ ऐसा था जो प्रदेश कांग्रेस की सियासत में बिखराव के बीज बोने वाला था। हम सरकार के बनने की कहानी बता रहे हैं, लेकिन कांग्रेस और बीजेपी के अंदर हुई दो घटनाओं का जिक्र करना जरूरी है। सत्ता के राजपथ में रायपुर ने एंट्री लेते ही दो सियासी किस्से दर्ज कर लिए। एक किस्सा सीएम के चयन के लिए पहुंचे अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से जुड़ा है। कहते हैं कि अजीत जोगी को सीएम बनाए जाने के फैसले से स्व विद्याचरण शुक्ल बेहद नाराज हो गए, तो उन्हें मनाने उनके बंगले पहुंचे दिग्गी राजा। वहीं पर विद्याचरण शुक्ल के आक्रोशित समर्थकों ने न केवल दिग्गी से झूमाझटकी की, बल्कि उनका कुर्ता भी फाड़ दिया। दूसरा किस्सा बीजेपी में नेता प्रतिपक्ष के चयन को लेकर है। बीजेपी के तत्कालीन महासचिव और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ये जिम्मेदारी मिली कि वो नेता प्रतिपक्ष का चेहरा चुनें। जब वो इसके लिए रायपुर पहुंचें तो उन्हें भी बीजेपी के एक गुट का कोपभाजन बनना पड़ा। अजीत जोगी के सीएम बनने से छत्तीसगढ़ कांग्रेस में सत्ता समीकरण तो बदले ही, लेकिन उन्होंने विपक्ष में बैठे बीजेपी को भी चैन से रहने न दिया और उसे एक ऐसी गहरी चोट दी, जिसकी टीस आज भी गई नहीं है।

छत्तीसगढ़ की पहली सरकार के गठन के वक्त कांग्रेस के पास 48 विधायक थे, जबकि बीजेपी 36 सीटों पर काबिज थी। कांग्रेस पूर्ण बहुमत में थी लेकिन ऐसा कहा जाता है कि गुटों में बंटे विधायकों में सीएम जोगी के समर्थक कम थे। ऐसे में वो किसी धमाके के फिराक में थे। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद पहला सियासी धमाका जो हुआ उसके सूत्रधार अजीत जोगी ही थे। उन्होंने रातोंरात बीजेपी में सेंधमारी की और एक झटके में उसके 12 विधायकों को अपने खेमे में ला खड़ा किया। यही नहीं अपना विधानसभा उपचुनाव भी उस सीट से लड़ा जहां बीजेपी ने चुनाव जीता था। दरअसल मरवाही से बीजेपी विधायक थे रामदयाल उइके वो भी उन 12 विधायकों में शामिल थे जो कांग्रेस में शामिल हुए। मरवाही की सीट से जोगी ने चुनाव लड़ा और जीते, तब से अजीत जोगी मरवाही में अजेय बने रहे।

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साल 2003 के आते-आते छत्तीसगढ़ पहले विधानसभा चुनाव के मुहाने पर आ खड़ा हुआ। अजीत जोगी आत्मविश्वास से लबरेज थे। भाजपा समीकरणों को समझ रही थी। लखीराम अग्रवाल दिल्ली की दौड़ लगा रहे थे। दिलीप सिंह जूदेव मूंछों को दांव पर लगा चुके थे, तभी प्रदेश में एक और सियासी धमाका हुआ। इस बार भी बम बीजेपी के खेमे में ही फूटा। .जूदेव का एक स्टिंग वीडियो अचानक नेशनल मीडिया में हर तरफ नजर दिखने लगी, तब जूदेव केंद्रीय मंत्रीमंडल के सदस्य भी थे। 2003 का चुनाव दोनों दलों ने शिद्दत से लड़ा। विद्याचरण शुक्ल ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का दामन थाम लिया। मुकाबला कुछ त्रिकोणीय सा हो गया। नतीजा बीजेपी का कमल खिल गया और जोगी सत्ता से हाथ धो बैठे। मुख्यमंत्री के रूप में अजीत जोगी का कार्यकाल महज 3 साल का था। लेकिन उनके विजन, उनकी दूरदर्शिता प्रशासन पर उनकी पकड़ और एक मुख्यमंत्री के रूप में उनकी देशव्यापी पहचान उन्हें सबसे अलग खड़ा करती है। अजीत जोगी की विदाई के साथ ही नई सरकार के लिए बीजेपी में दौड़ शुरू हो गई। स्टिंग कांड ने मुख्यमंत्री की दौड़ से जूदेव को बाहर कर दिया। लखीराम अग्रवाल, नंदकुमार साय की दावेदारी को रोकना चाहते थे। इस खींचतान में बीजेपी के गलियारे में एक नया चेहरा नक्षत्रबलि की तरह उभरा, और जिसने लगातार 15 साल तक अपनी सरकार चलाई। वो थे डॉ रमन सिंह।

रमन सिंह मुख्यमंत्री बन सकते हैं, इसकी कल्पना भी लोगों ने नहीं की थी। वो विधायक रहे, सांसद रहे और मुख्यमंत्री बनने से पहले केंद्र में मंत्री भी रहे, फिर बीजेपी की कमान संभालने रायपुर लौटे। साय मरवाही में जोगी से हार गए और रमन सिंह सीएम बन गए। भय, भूख और भ्रष्टाचार की मुक्ति के नारे के साथ सत्ता में आई थी बीजेपी। रमन सिंह के सामने पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री के रूप में कई चुनौतियां थीं। नक्सल हिंसा का उभार, बढ़ता पलायन और बुनियादी विकास के लिए संसाधनों की कमी। विशेषकर नक्सल हमलों ने मुख्यमंत्री के रूप में रमन सिंह की अग्निपरीक्षा ली। लेकिन नए पन के शुरुआती हिचक के बाद रमन सिंह आगे बढ़े और फिर बढ़ते ही गए। छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण के साथ ही नई राजधानी को लेकर योजनाएं बनने लगी थी। पहले मुख्यमंत्री के रूप में सीएम जोगी ने इसका ब्लू प्रिंट भी तैयार कर लिया था। लेकिन 2003 में जब रमन सिंह सत्ता में आए, तो उन्होंने नए सिरे से नई राजधानी परियोजना को आकार दिया। नवा रायपुर की नीव उन्होंने ही रखी और उनके प्रमुख अवदानों में इस विश्वस्तरीय शहर की भी गिनती होती है। रमन राज के 5 साल बीत गए। एक और चुनाव के दरवाजे पर खड़ा था छत्तीसगढ़। साल था 2008 का एक बार फिर अजीत जोगी के नेतृत्व में कांग्रेस ने चुनाव लड़ा। जबकि सामने थे रमन सिंह और उनकी पार्टी बीजेपी।

2003 में बीजेपी ने जीत का जो अध्याय शुरू किया था, वो 2008 में भी जारी रखा । इस बार भी सरकार बस्तर को साधने में लगी थी। क्योंकि कहते हैं कि छत्तीसगढ़ में वही राज करता है जो बस्तर जीतता है। अब तक डॉ. रमन ने अपनी छवि चाउंर वाले बाबा की बना ली थी। लेकिन नक्सली वारदातें पीछा नहीं छोड़ रही थी। अजीत जोगी की कांग्रेस पर अब तक पूरी पकड़ कायम थी। महेंद्र कर्मा, महंत, धनेंद्र साहू, सत्यनारायण शर्मा प्रदेश के पटल पर कांग्रेस के बड़े नेताओं में शुमार थे। 2008 में करीबी फाइट के बावजूद रमन सरकार वोट परसेंट बढ़ाकर जीत गई। इस तरह दूसरी बार रमन सिंह के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार छत्तीसगढ़ में सिंहासन पर काबिज हुई। कहा जाता है कि चांउर वाले बाबा के रूप में रमन सिंह की ख्याति ने ही उन्होंने दूसरी बार मुख्यमंत्री बनाने में अहम भूमिका निभाई। दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद रमन सिंह ने पार्टी के अंदर अपनी स्थिति मजबूत कर ली। उनके प्रतिद्वंद्वियों का वर्चस्व घटता गया और उनका कद बढ़ता गया। अब वो सत्ता और संगठन दोनों ही जगह अपने तरीके से फैसले लेने की स्थिति में थे। सीएम रमन ने अपने दूसरे कार्यकाल में पीडीएस के साथ रोजगारपरक शिक्षा को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल किया। लेकिन नक्सल हिंसा को रोकने में उनकी नाकामी विपक्ष को बार-बार हमले का मौका भी देती रही।

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2013 चुनावी साल था, दोनों दल चुनावी तैयारियों में जुटे हुए थे। कांग्रेस प्रदेश भर में परिवर्तन रैली निकाल रही थी। इसी दौरान नक्सल हिंसा का सबसे खतरनाक चेहरा दुनिया ने देखा..23 मई 2013 को बस्तर की झीरम घाटी से होकर जब परिवर्तन रैली गुजर रही थी। इसी दौरान नक्सलियों ने एंबुस लगाकर काफिले पर हमला बोल दिया। इस हमले में विद्याचरण शुक्ल, महेंद्र कर्मा और नंदकुमार पटेल समेत करीब तीन दर्जन नेताओं और सुरक्षा जवानों ने अपनी जान गंवाई। इस हमले ने बीजेपी को चुनाव में भले ही क्षति न पहुंचाई पर सियासी पंडित इसको रमन सिंह के कार्यकाल के एक दागदार घटनाक्रम के रूप में देखते हैं। एक तरफ बीजेपी दूसरी बार छत्तीसगढ़ में विजयी हुई, तो वहीं केंद्र में 10 साल की यूपीए सरकार का पराभव हो चुका था और नए नायक के रूप में नरेंद्र मोदी उभर रहे थे। साल 2013 रमन सिंह की अगुवाई में बीजेपी फिर एक बार जीत के लिए चुनावी मैदान पर थी। इस बार भी कांटे की टक्कर थी। कांग्रेस को बड़ी उम्मीदें थीं, लेकिन नतीजे आए तो महज दशमलव 75 परसेंट वोट से वो चुनाव हार गई।

देश में एक तरफ मोदी उभर रहे थे, तो दूसरी ओर डॉ रमन एक और चुनाव की तैयारी में व्यस्त थे। लेकिन इस बार उनकी राह थोड़ी मुश्किल दिख रही थी। पार्टी के अंदर उनके खिलाफ आवाजें उठने लगी थीं। इधर झीरम हमले में नंदकुमार पटेल की मौत के बाद एक बार फिर कांग्रेस की कमान जोगी में हाथों में दिख रही थी। हालांकि चरणदास महंत को हाईकमान ने मुखिया के रूप में नियुक्त किया था। विशेषज्ञ ये मान रहे थे कि परिवर्तन रैली पर हमले से जो रोष और शोक उभरा, उसका सियासी लाभ कांग्रेस को मिलेगा। लेकिन नजदीकी मुकाबले बावजूद जीत बीजेपी की ही हुई, वो 49 सीटों के साथ सत्ता में काबिज हुई। केंद्र में बीजेपी के उभार के बाद रमन सिंह की राजनीति पर भी इसका असर पड़ा। दिल्ली के ताकतवर होने से उनकी ताकत कम होने लगी। पार्टी के कई नेता उनके विरोध में नजर आने लगे पर बीजेपी के रिकॉर्डधारी मुख्यमंत्री के रूप में उनकी पहचान बनी रही। रमन राज में करप्शन के कई आरोप लगे पर उनकी इमेज फिर भी एक समावेशी नेता के तौर पर मजबूत थी।

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साल 2018…चुनाव का साल फिर रमन सिंह की अगुवाई में बीजेपी मैदान पर थी, लेकिन इस बार कांग्रेस से उनके सामने थे प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल। 2014 में अंतागढ़ सीडी कांड की आंच ने पूर्व सीएम जोगी के दामन पर एक और दाग लगा दिया था। कांग्रेस में उनके खिलाफ माहौल बनने लगा था। पार्टी अध्यक्ष के रूप में भूपेश बघेल उनके मुखर विरोधी बन गए थे। आखिर बिगड़ते माहौल को भांपकर जोगी ने कांग्रेस छोड़ दी और नई पार्टी का ऐलान कर दिया। ये वक्त था 2016 का, जब 2018 का चुनाव आया तो छत्तीसगढ़ में पहली बार तीन दल मुकाबले में नज़र आ रहे थे। कांग्रेस इस बार बेहतर तैयारियों के साथ मैदान पर थी। घोषणापत्र को उनसे अपना प्रमुख हथियार बनाया। बिजली बिल हाफ और कृषि कर्ज माफ के वादे ने जादू की तरह असर किया। नतीजा जनता ने परिवर्तन का बिगुल बजा दिया, प्रचंड बहुमत से कांग्रेस विजयी रही। जोगी कांग्रेस ने पहले ही चुनाव में 8 सीटों के साथ खाता खोला और बीजेपी हार गई। इसके साथ ही 15 साल के रमन राज का सूरज अस्त हो गया। अब छत्तीसगढ़ का सिंहासन नई सरकार और नए नेतृत्व की प्रतीक्षा करने लगा।

सत्ता में परिवर्तन के बाद छत्तीसगढ़ राज्य में पहली बार कांग्रेस की निर्वाचित सरकार बनी। इसके लिए पार्टी को 15 साल इंतजार करना पड़ा। अब बारी थी मुख्यमंत्री के चुनाव की, सबकी निगाहें दिल्ली पर टिकी हुई थीं। कौन बनेगा मुख्यमंत्री? ये जंग रायपुर से लेकर दिल्ली तक लड़ी गई और जो चेहरा विजेता बनकर उभरा वो था भूपेश बघेल का, जिन्होंने छत्तीसगढ़ के तीसरे मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। 5 साल के सफर के बाद 2023 में एक और चुनाव में कांग्रेस और बीजेपी सामने हुई। इस बार दोनों ही दल लोकलुभावन घोषणापत्रों के जरिए एक दूसरे को मात देने की कोशिश में नज़र आए। इस बार भी भूपेश बघेल ही कांग्रेस के प्रमुख चेहरा रहे तो दूसरी ओर बीजेपी ने केंद्रीय नेताओं के बूते किला लड़ाने का प्रयत्न किया । पार्टी पर गहरी पकड़ रखने वाले भूपेश बघेल ने मुख्यमंत्री के रूप में अपनी जो पहचान बनाई, उसमें एक ठेठ छत्तीसगढ़िया नेता का चेहरा उभरा। शासन का जो मॉडल उन्होंने तैयार किया उसमें कल्याणकारी योजनाएं तो हैं ही, साथ में नरवा, घुरुवा, गरुआ, बारी, धान, किसान, बोनस, राम, धान और छत्तीसगढ़िया संस्कृति को अपनी धूरी बनाई। इस तरह बन गए जनता के कका और भरे मंचों से बेखटके ये कहने से गुरेज नहीं किया कि ‘कका अभी जिंदा हे’।

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23 के नतीजे आने बाकी हैं। सरकार किसानों के भरोसे मैदान में थी तो विपक्ष महिलाओं के सहारे। पिक्चर अभी बाकी है। 3 दिसंबर का दिन तय करेगा इसमें कौन रहेगा? आप की तरह हमें भी ये इंतजार है कि इस नए आवास में आने वाला मुख्यमंत्री आखिर किस दल से होगा? कांग्रेस या बीजेपी?

 

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