तैरते रोबोट बताते हैं कि हवा में मौजूद धूल दक्षिणी महासागर को कितना उर्वरक बनाती है |

तैरते रोबोट बताते हैं कि हवा में मौजूद धूल दक्षिणी महासागर को कितना उर्वरक बनाती है

तैरते रोबोट बताते हैं कि हवा में मौजूद धूल दक्षिणी महासागर को कितना उर्वरक बनाती है

:   Modified Date:  May 16, 2024 / 02:23 PM IST, Published Date : May 16, 2024/2:23 pm IST

(जैकब वीस, एंड्रयू बॉवी, पीटर स्ट्रटन और ज़ाना चेज़, तस्मानिया विश्वविद्यालय, क्रिस्टीना शालेनबर्ग, सीएसआईआरओ)

होबार्ट (ऑस्ट्रेलिया), 16 मई (द कन्चरसेशन) दक्षिणी महासागर हमारी पृथ्वी की जलवायु के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र है और बड़े पैमाने पर सूक्ष्म समुद्री पौधों का घर है, जिन्हें फाइटोप्लांकटन के रूप में जाना जाता है और यह अंटार्कटिक खाद्य जाल का आधार बनाते हैं।

रोबोटिक फ्लोट्स के एक बेड़े का उपयोग करते हुए किए गए हमारे अध्ययन, जो आज नेचर में प्रकाशित हुआ है, से पता चलता है कि हवा में उड़ने वाली धूल दक्षिणी महासागर के फाइटोप्लांकटन विकास के एक तिहाई हिस्से की बढ़वार के लिए पर्याप्त लोहा प्रदान करती है। इसे जानने से हमें यह समझने में मदद मिलेगी कि ग्लोबल वार्मिंग उन प्रमुख जलवायु प्रक्रियाओं को कैसे प्रभावित करेगी जिनमें फाइटोप्लांकटन शामिल है।

दक्षिणी महासागर जलवायु के ‘‘आघात अवशोषक’’ के रूप में कार्य करता है। इसका ठंडा पानी और विशाल क्षेत्र हर साल ग्रह के महासागरों द्वारा अवशोषित मानव-जनित कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ2) का 40 प्रतिशत तक ग्रहण करता है।

मानव-जनित सीओे2 मुख्य रूप से समुद्र में प्रवेश करती है क्योंकि यह सतह पर घुल जाती है। हालाँकि, जैविक प्रक्रियाएँ जो सतह से गहरे समुद्र में भारी मात्रा में सीओ2 स्थानांतरित करती हैं, समुद्र के प्राकृतिक कार्बन चक्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

दक्षिणी महासागर में इन प्रक्रियाओं में थोड़ा सा भी बदलाव जलवायु आघात अवशोषक को कमजोर या मजबूत कर सकता है। यहीं पर फाइटोप्लांकटन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

फाइटोप्लांकटन: छोटा लेकिन शक्तिशाली

भूमि पर पौधों की तरह, फाइटोप्लांकटन प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से सीओ2 को बायोमास में परिवर्तित करता है। जब फाइटोप्लांकटन मर जाते हैं, तो वे गहरे समुद्र में डूब जाते हैं। यह प्रभावी ढंग से कार्बन को दशकों या यहां तक ​​कि सैकड़ों वर्षों तक रोक कर रखता है। इसे जैविक कार्बन पंप के रूप में जाना जाता है, और यह पृथ्वी की जलवायु को विनियमित करने में मदद करता है।

फाइटोप्लांकटन को पनपने के लिए पोषक तत्वों और प्रकाश की आवश्यकता होती है। नाइट्रेट के रूप में नाइट्रोजन, इन आवश्यक पोषक तत्वों में से एक है और दक्षिणी महासागर में प्रचुर मात्रा में है। वसंत और गर्मियों में बढ़वार की अवधि के दौरान, फाइटोप्लांकटन नाइट्रेट ग्रहण करता है।

यह वैज्ञानिकों को एक अनूठा अवसर प्रदान करता है – यह मापकर कि मौसमी रूप से कितना नाइट्रेट गायब हो जाता है, वे फाइटोप्लांकटन की वृद्धि और उनके बायोमास में एकत्रित कार्बन की गणना कर सकते हैं।

लेकिन इसमें एक झोल है। आयरन, एक अन्य आवश्यक पोषक तत्व, दक्षिणी महासागर में कम आपूर्ति में है। यह कमी फाइटोप्लांकटन की वृद्धि को रोकती है, जिससे जैविक कार्बन पंप की दक्षता कम हो जाती है।

धूल दक्षिणी महासागर में जीवन को बढ़ावा देती है

लोहा आमतौर पर मिट्टी में पाया जाता है। हवाएँ लौह युक्त धूल को महाद्वीपों से महासागरों तक ले जाती हैं। धूल से प्राप्त लोहे की यह आपूर्ति फाइटोप्लांकटन के खिलने, समुद्र के हिस्सों को हरा-भरा करने और कार्बन पंप को मजबूत करने का काम कर सकती है।

ऐतिहासिक रूप से, फाइटोप्लांकटन पर लौह निषेचन के प्रभावों का अध्ययन करने के लिए – चाहे लोहा धूल, अन्य प्राकृतिक स्रोतों से आया हो, या जानबूझकर जोड़ा गया हो – वैज्ञानिकों को सुदूर दक्षिणी महासागर में महंगी शोध यात्राएं शुरू करनी पड़ीं।

हालाँकि, ऐसे प्रयोगों से प्राप्त अंतर्दृष्टि छोटे क्षेत्रों और कुछ मौसमों के दौरान छोटी अवधि तक ही सीमित थी। पूरे दक्षिणी महासागर में पूरे वर्ष फाइटोप्लांकटन पर धूल के प्रभाव के बारे में बहुत कम जानकारी थी।

इस अंतर को दूर करने के लिए हमने रोबोट की ओर रुख किया।

महासागरीय रोबोट धूल के पथ का अनुसरण करते हैं

पिछले एक दशक में, अनुसंधान संगठनों ने दुनिया भर में रोबोटिक महासागरीय नावों का एक बेड़ा तैनात किया है। ये रोबोट नाइट्रेट सांद्रता सहित समुद्री संपत्तियों पर लगातार नज़र रखते हैं।

अपने अध्ययन में, हमने दक्षिणी महासागर में 13,600 स्थानों पर नाइट्रेट माप का विश्लेषण किया। हमने नाइट्रेट गायब होने से फाइटोप्लांकटन वृद्धि की गणना की और इन वृद्धि अनुमानों को धूल जमाव के कंप्यूटर मॉडल के साथ जोड़ा।

इस नए दृष्टिकोण के साथ, हमने धूल से प्राप्त लोहे की आपूर्ति और फाइटोप्लांकटन वृद्धि के बीच एक सीधा संबंध उजागर किया। महत्वपूर्ण बात यह है कि हमने यह भी पाया कि धूल केवल फाइटोप्लांकटन की वृद्धि से मेल नहीं खाती है – यह वास्तव में लोहे की आपूर्ति करके इसे ईंधन देती है।

हमने इस संबंध का उपयोग दक्षिणी महासागर के अतीत, वर्तमान या भविष्य के उत्पादकता मानचित्र बनाने के लिए किया। इन मानचित्रों से पता चलता है कि धूल आज दक्षिणी महासागर में लगभग एक तिहाई फाइटोप्लांकटन वृद्धि में सहयोग करती है।

हिमयुग के दौरान, शुष्क परिस्थितियों, समुद्र के निचले स्तर और तेज़ हवाओं के संयोजन का मतलब था कि दक्षिणी महासागर पर धूल का जमाव आज की तुलना में 40 गुना अधिक था।

जब हम पिछले हिमयुग के धूल सिमुलेशन को अपने नए स्थापित संबंधों पर लागू करते हैं, तो हम अनुमान लगाते हैं कि इन धूल भरे समय के दौरान फाइटोप्लांकटन की वृद्धि आज की तुलना में दो गुना अधिक थी।

इसलिए, फाइटोप्लांकटन के विकास को बढ़ावा देकर, धूल ने संभवतः हिमयुग के दौरान वायुमंडलीय सीओ2 सांद्रता को कम रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

क्या फर्क पड़ता है?

ग्लोबल वार्मिंग और भूमि उपयोग परिवर्तन भविष्य में समुद्र में धूल वितरण को तेजी से बदल सकते हैं।

इन बदलावों के समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र और मत्स्य पालन के लिए महत्वपूर्ण परिणाम होंगे, और हमारा शोध इन परिवर्तनों का पूर्वानुमान लगाने में मदद करने के लिए जानकारी प्रदान करता है।

ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने के लिए, यह जरूरी है कि हम वायुमंडल से सीओ2 को सक्रिय रूप से हटाने के लिए सुरक्षित और प्रभावी तरीके खोजें। एक प्रस्तावित और विवादास्पद रणनीति में दक्षिणी महासागर को लोहे से उर्वरित करना, प्राकृतिक प्रक्रियाओं की नकल करना शामिल है जिससे हिमयुग के दौरान सीओ2 में कमी आई।

हमारे नतीजे बताते हैं कि ऐसी रणनीति दक्षिणी महासागर के कम से कम धूल वाले हिस्सों में उत्पादकता को बढ़ावा दे सकती है, लेकिन इस हस्तक्षेप के पारिस्थितिक परिणामों और कार्बन कैप्चर करने में इसकी दीर्घकालिक प्रभावशीलता के बारे में अनिश्चितताएं बनी हुई हैं।

प्रकृति ने अतीत में ऐसा कैसे किया है, इसका अध्ययन करके, हम जलवायु परिवर्तन को कम करने के लिए समुद्र को उर्वर बनाने के संभावित परिणामों और व्यावहारिकता के बारे में अधिक जान सकते हैं।

द कन्वरसेशन एकता एकता

एकता

 

(इस खबर को IBC24 टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)

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