फेसबुक पर स्कूलों के पोस्ट्स से छात्रों की निजता को हो सकता है खतरा

फेसबुक पर स्कूलों के पोस्ट्स से छात्रों की निजता को हो सकता है खतरा

: , July 18, 2021 / 12:00 PM IST

(जोशुआ रोसेनबर्ग, स्टेम शिक्षा के सहायक प्रोफेसर, यूनिवर्सिटी ऑफ टेनेसी)

नेशविल(अमेरिका), 18 जुलाई (द कनवर्सेशन) हमारी तरह ही अमेरिका में स्कूल सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं। वे अपने अकाउंट्स का इस्तेमाल समय पर सूचना देने, समुदाय बनाने और कर्मचारियों तथा छात्रों के बारे में बताने के लिए करते हैं। हालांकि, हमारे अध्ययन में यह पता चला कि स्कूलों की सोशल मीडिया गतिविधि से छात्रों की निजता को नुकसान पहुंच सकता है।

शिक्षा में डेटा विज्ञान की विशेष जानकारी रखने वाले अनुसंधानकर्ता के तौर पर मैं और मेरे सहकर्मी अनजाने में ही छात्रों की निजता के विषय पर पहुंचे। हम यह खोज रहे थे कि कोविड-19 महामारी के शुरुआती दिनों खासतौर से मार्च और अप्रैल 2020 के बीच स्कूलों ने सोशल मीडिया का इस्तेमाल कैसे किया।

इस अध्ययन में हमने कुछ हैरानी भरा पाया कि कैसे फेसबुक काम करता है : हम शिक्षकों और छात्रों की तस्वीरों के साथ ही स्कूलों के पोस्ट देख सकते थे जबकि हम अपने निजी फेसबुक खातों से लॉगइन नहीं थे।

लॉग इन न होने के बावजूद पेजों और तस्वीरों को देख पाने से यह पता चला कि न केवल स्कूलों के पोस्ट देखे जा सकते हैं बल्कि डेटा माइनिंग या नए अनुसंधान तरीकों का इस्तेमाल कर इन्हें देखा भी जा सकता है। इन तरीकों में कंप्यूटर और सांख्यिकीय तकनीक का इस्तेमाल शामिल है।

चूंकि अमेरिका के सभी स्कूल अपनी वेबसाइटों को राष्ट्रीय शिक्षा सांख्यिकी केंद्र में दर्ज कराते हैं और कई स्कूल अपने फेसबुक पेजों को अपनी वेबसाइटों से जोड़ते हैं, ऐसे में इन पोस्ट्स को व्यापक तरीके से देखा जा सकता है। दूसरे शब्दों में कहे तो न केवल अनुसंधानकर्ता बल्कि विज्ञापनदाता और हैकर भी डेटा माइनिंग विधियों का इस्तेमाल फेसबुक पर किसी भी स्कूल के सभी पोस्ट्स का इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे चलते हमने छात्रों के निजता के उल्लंघन पर अध्ययन किया।

खतरे मौजूद हैं :

छात्रों की तस्वीरों को आसानी से देख पाना सोशल मीडिया पर किसी की निजता का खतरा है। उदाहरण के लिए अभिभावकों ने सोशल मीडिया पर उनके बच्चों के बारे में शिक्षकों द्वारा पोस्ट करने पर चिंता जतायी है।

गनीमत यह है कि हमारे अध्ययन में छात्रों के बारे में स्कूलों द्वारा पोस्ट करने से उन्हें किसी तरह का खतरा पहुंचने का खुलासा नहीं किया गया है। हालांकि कुछ संभावित खतरे हैं जैसे कि भविष्य में पीछा करने वाले लोग और छात्रों को चिढ़ाने वाले लोग उनकी पहचान करने के लिए इन पोस्ट्स का इस्तेमाल कर सकते हैं।

छात्र कुछ और खतरों का सामना कर सकते हैं। चेहरे की पहचान करने वाली कंपनी क्लीयरव्यू वर्ल्ड वाइड वेब से इंटरनेट के आंकड़ें और सोशल मीडिया के आंकड़ें एकत्रित करती है। क्लीयरव्यू फिर इन आंकड़ों को कानून प्रवर्तन एजेंसियों को बेचती है जो किसी संभावित संदिग्ध या व्यक्ति की तस्वीर अपलोड कर सकती हैं। क्लीयरव्यू पहले ही फेसबुक पर लोगों की पोस्ट से अमेरिका में नाबालिगों की तस्वीरों को हासिल करती है। ऐसी संभावना है कि स्कूलों के फेसबुक पेज से छात्रों की तस्वीरें हासिल की जाए और क्लीयरव्यू जैसी कंपनियां इनका इस्तेमाल करें।

लाखों छात्रों की तस्वीरें उपलब्ध हैं :

अपने अध्ययन में हमने स्कूलों के पोस्ट्स पढ़ने के लिए फेसबुक द्वारा उपलब्ध कराए संघीय आंकड़ें और एक विश्लेषणात्मक टूल का इस्तेमाल किया। 2005 से 2020 तक करीब 16,000 स्कूलों के 1.79 करोड़ पोस्ट्स को एकत्रित करके हमने बिना सोचे-समझे 100 पोस्ट्स का चयन किया। हमने यह पता लगाया कि क्या इन पोस्ट्स में छात्रों का नाम लिखा गया और क्या किसी तस्वीर में उनके चेहरे साफ तौर पर दिख रहे हैं। अगर ये दोनों चीजें है तो हम मानते हैं कि उस छात्र को नाम और स्कूल से पहचाना जा सकता है।

चूंकि हममे में से कई लोग अपनी, दोस्तों और परिवार तथा कई बार अपने बच्चों की तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं लेकिन स्कूल के पोस्ट अलग हैं। हम यह नियंत्रित कर सकते हैं कि कौन हमारे पोस्ट देख सकता है। अगर हम केवल दोस्तों और परिवार को ही यह दिखाना चाहते हैं तो हम निजता की सेटिंग्स में बदलाव कर सकते हैं। लेकिन लोग यह नियंत्रित नहीं कर सकते कि स्कूल कैसे अपने पोस्ट और तस्वीरें साझा करें और हमने जिन पोस्ट्स का विश्लेषण किया वे सभी आसानी से देखी जा सकती थीं। दुनिया में कोई भी उन्हें देख सकता है।

अगर कोई इस स्थिति के संभावित नुकसान को कम करना चाहता है तो छोटे-छोटे कदम उठाए जा सकते हैं।

1) छात्रों का पूरा नाम लिखने से बचें

छात्रों का पूरा नाम न लिखने से किसी भी छात्र को निशाना बनाना मुश्किल हो जाएगा और छात्रों के आंकड़ों को बेचे जाने के खतरे से बचा जा सकता है।

2) स्कूल के पेज को निजी बनाए

स्कूल के पेज को निजी बनाने का मतलब है कि डेटा माइनिंग और मुश्किल हो जाएगी। इस एक कदम से छात्रों की निजता पर खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

3) ऑप्ट-इन मीडिया नीतियों का इस्तेमाल

ऑप्ट-इन मीडिया रिलीज नीतियों में अपने बच्चें की तस्वीरें साझा करने के लिए माता-पिता की मंजूरी की आवश्यकता होती है।

कुल मिलाकर स्कूलों के फेसबुक पेज हमारे निजी सोशल मीडिया अकाउंट्स से अलग होते हैं और इन पेजों पर पोस्ट्स से छात्रों की निजता को खतरा हो सकता है। हमारे अध्ययन से पता चलता है कि शिक्षक स्कूलों के अकाउंट्स से पोस्ट करते समय छात्रों की निजता की रक्षा के लिए छोटे-छोटे कदम उठा सकते हैं।

द कनवर्सेशन गोला सुभाष

सुभाष

 

(इस खबर को IBC24 टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)