गरियाबंद (छत्तीसगढ़), 11 जून (भाषा) छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले स्थित उदंती-सीतानदी बाघ अभयारण्य के भीतर रहने वाले करीब आठ ग्राम पंचायतों के निवासियों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम खून से पत्र लिखकर बिजली लाइन के माध्यम से पारंपरिक बिजली आपूर्ति की मांग की है।
ग्रामीणों का कहना है कि उनके क्षेत्र में स्थापित सौर ऊर्जा प्रणाली (सोलर पावर सिस्टम) पर्याप्त नहीं है और अधिकांश जगहों पर ठीक से काम भी नहीं कर रही है।
लंबित मांग को लेकर बुधवार को अभयारण्य के राजापड़ाव क्षेत्र के अडगड़ी गांव में बड़ी संख्या में ग्रामीण एकत्र हुए और प्रदर्शन किया।
इस दौरान प्रदर्शनकारियों द्वारा बुलाए गए एक चिकित्सा प्रैक्टिशनर ने अलग-अलग इंजेक्शन की मदद से ग्रामीणों का रक्त निकाला, जिसका उपयोग प्रधानमंत्री को संबोधित पत्र लिखने में किया गया।
क्षेत्र के जिला पंचायत सदस्य संजय नेताम ने संवाददाताओं को बताया कि राजापड़ाव क्षेत्र की आठ ग्राम पंचायतों के लगभग 48 गांवों के लोगों ने इस अभियान में हिस्सा लिया।
उन्होंने कहा कि ग्रामीणों ने अपने खून से सैकड़ों पत्र लिखकर स्पीड पोस्ट के माध्यम से प्रधानमंत्री को भेजे हैं।
नेताम ने कहा, ‘‘पत्रों में हमने प्रधानमंत्री को अवगत कराया कि हमारे बच्चे आज भी अंधेरे में पढ़ाई करने को मजबूर हैं और मरीजों को रात के समय भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। हम वर्षों से बिजली का इंतजार कर रहे हैं। हम वन्यजीव संरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि चाहते हैं कि जंगल और जंगल में रहने वाले लोग साथ-साथ रहें।’
उन्होंने बताया कि ग्रामीणों ने क्षेत्र में बिजली उपलब्ध कराने की मांग करते हुए अपने खून से लगभग 700 से 800 पत्र लिखे हैं।
प्रदर्शन में शामिल ग्रामीण पतंग मरकाम ने कहा कि 2006 से अब तक हजारों आवेदन, ज्ञापन और आंदोलन किए जा चुके हैं, लेकिन पारंपरिक बिजली आपूर्ति की मांग अब तक पूरी नहीं हुई है।
उन्होंने बताया कि हाल ही में राज्य सरकार के ‘सुशासन तिहार’ (जन शिकायत निवारण अभियान) के दौरान भी यह मुद्दा उठाया गया था, लेकिन उन्हें बताया गया कि मामला केंद्र सरकार के स्तर पर लंबित है।
इन आठ ग्राम पंचायतों में से भूतबेड़ा, कोचेन्गा, गोरगांव, गड़ाडीह और कोपड़ी पंचायतों के लगभग 30 गांव और बस्तियां पूरी तरह सौर ऊर्जा प्रणाली पर निर्भर हैं। वहीं, ग्रिड कनेक्टिविटी नहीं होने के कारण अडगड़ी, गोना और शोभा ग्राम पंचायतों के कुछ हिस्सों में भी सोलर पावर ही बिजली का एकमात्र स्रोत है।
गरियाबंद के अतिरिक्त कलेक्टर पंकज डाहिरे ने बृहस्पतिवार को कहा कि यह मुद्दा हाल ही में गरियाबंद में आयोजित एक बैठक के दौरान मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के समक्ष उठाया गया था और इस पर उच्च स्तर पर विचार किया जा रहा है।
उधर, उदंती-सीतानदी बाघ अभयारण्य के उपनिदेशक वरुण जैन ने कहा कि उन्होंने स्थानीय निवासियों और जनप्रतिनिधियों से अपील की है कि पारंपरिक बिजली ढांचे, सड़कों और अन्य विकास कार्यों की मांग करते समय संरक्षित क्षेत्र की पारिस्थितिक संवेदनशीलता और कानूनी स्थिति का भी ध्यान रखा जाए।
उन्होंने कहा कि यह बाघ अभयारण्य भूजल पुनर्भरण, जलवायु संतुलन, मृदा संरक्षण और जैव विविधता संरक्षण जैसी महत्वपूर्ण पारिस्थितिक सेवाएं प्रदान करता है। यह हाथी, बाघ, तेंदुआ, स्लॉथ भालू और जंगली भैंस जैसी कई लुप्तप्राय और पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण प्रजातियों का प्राकृतिक आवास भी है।
जैन ने चेताया कि वन्यजीव आवासों के भीतर बिजली लाइनों, सड़कों और स्थायी आधारभूत ढांचे का विस्तार मानव-वन्यजीव संघर्ष को बढ़ा सकता है।
उन्होंने कहा कि बाघ अभयारण्य प्रशासन मौजूदा सौर ऊर्जा प्रणाली की मरम्मत और उन्हें अधिक प्रभावी बनाने, तथा पर्यावरण को न्यूनतम नुकसान पहुंचाते हुए मौजूदा कच्ची सड़कों के उन्नयन जैसे विकल्पों पर विचार कर रहा है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि रिजर्व क्षेत्र के भीतर किसी भी प्रकार के पारंपरिक बुनियादी ढांचे के विकास से जुड़ा निर्णय वन्यजीव संरक्षण संबंधी कानूनों और महत्वपूर्ण आवास क्षेत्रों तथा वन्यजीव गलियारों की सुरक्षा के लिए जारी न्यायालयी निर्देशों के अनुरूप ही लिया जाएगा।
भाषा सं संजीव खारी
खारी